Thursday, March 13, 2008

समुद्र की लहरें

समुद्र की लहरें
कितने जोश में
कितने वेग से
चली आतीं हैं
इतराती, मंडराती
किनारे की ओर।

और रह जातीं हैं
अपना सर फोड़कर
किनारे की चट्टानों पर।
लहर खत्म हो जाती है
रह जाता है -
पानी का बुलबुला
थोड़ा सा झाग।

लहरें निराश नहीं होतीं
हार नहीं मानतीं ।
चली आती हैं
बारबार, निरंतर, लगातार
एक के पीछे एक।

एक दिन सफल होतीं हैं
तोड़कर रख देतीं हैं
भारी भरकम चट्रटान को
पर फिर भी शान्त नहीं होतीं
आराम नहीं करतीं।

इनका क्रम चलाता रहता है।
चट्रटान के छोटे छोटे टुकड़े कर
चूर कर देतीं हैं -
उनका हौसला, उनके निशान।
बना कर रख देतीं हैं
रेत
एक बारीक महीन रेत
समुद्र तट पर फैली
एक बारीक महीन रेत।

मुंबई नगरी

यह महानगर बहुत बड़ा है।
यह सपनों की दुनिया है
सितारों की दुनिया है
सितारों के सपनों की दुनिया है।

यहाँ हर छोटे-बड़े शहर का,
गाँव का, कस्बे का आदमी
सपना लिये आता है।
नये सपने बनाता है।
सपने खरीदता है,
सपने बेचता है।
सपनों में ही रहता है।
और सपनों में ही खुश भी रहता है।

आप तो जानते हैं
सपने तो फिर सपने होते हैं
बहुत नाजुक होते हैं।
जरा नींद खुली तो टूट जाते है बेचारे।

इस नगरी के आदमी के साथ
यही होता है।
बेचारे की नींद खुलती है
तो सपने टूट जाते हैं।

नींद खुल जाये सपना टूट जाये
तो बेचारा क्या करे?
आँख मूंद कर सो जाये
फिर नये सपने में खो जाये?
या जाग जाये, उठ कर बैठ जाये
नींद को भगा दे, यथार्थ में जी ले?

सच बहुत कड़वा होता है
यथार्थ में जीना कठिन होता है।
इस महानगरी में -
उसे पटरी से हटकर
'चौल' (1) में रहना होता है।
उसे फुटपाथ पे सोना होता है।

इसीलिये ज्यादातर लोग यहाँ
नींद में सोये रहते हैं।
ज्यादातर लोग यहाँ
सपनों में खोये रहते हैं।

(1) मुम्बई में कतार में बने डिबियानुमा घर

संबंधों का रिश्तों से नाता

कितने नादान हैं, वो लोग
जो बाँधना चाहते हैं
संबंधों को
रिश्तों की परिभाषा में।

संबंध आदि से चला आ रहा
नाता है, कभी नहीं मिटता।
बना रहता है
एक आत्मा का दूसरी आत्मा से
सदियों सदियों तक।

रिश्तों की दायरा सीमित है
और परिभाषा संकीर्ण।
इसमें ढालने के लिये
संबंधों को काट छाँट कर
छोटा करना पड़ेगा,
और उनकी हत्या हो जायेगी।

अच्छा हो, वो छोड़ दें अपना प्रयास।
स्वच्छन्द जीने दें
संबंधों को।
रिश्तों से परे, दूर रहने दें उनको
किसी भी
कलुषित प्रदूषित भाव से दूर
पवित्र, पुनीत, पावन बन्धन में।

शरलक होल्मस (1) का पोता

मैंने एक बच्चे से पूछा -
'तुम्हें कौनसा मौसम अच्छा लगता है?'
उसने कहा - जाड़े का मौसम'
मैंने जान लिया -
बालक किसी धनवान की संतान है।
उसके पास पहनने को
कपड़े हैं, स्वेटर हैं, कोट है।
जरूर किसी अमीर घर की जोत है।

मैंने एक दूसरे बालक से पूछा -
तुम्हें कौनसा मौसम अच्छा लगता है?'
उसने कहा - बरसात का'
मैं जान गया यह बालक
किसी मध्यम वर्ग के घर का है।
इसके पास रहने को घर है।
घर पर एक छत है।
ये खुले आकाश के नीचे नहीं रहता।
बरसात में कभी-कभी
स्कूल की छुट्रटी करता होगा।
माँ बाप की आशाएं होंगी इसके साथ,
साथ ही डर भी - कहीं रपट न जाये
तरक्की की सीढ़ी से फिसल न जाये।

फिर मैंने एक तीसरे बालक से पूछा -
तुम्हें कौनसा मौसम अच्छा लगता है?'
उसने कहा - गर्मी का'
मैं जान गया वह खुले में रहता होगा।
जमीन पर या फुटपाथ पर सोता होगा।
बारिश में भीगता होगा
ठंड में ठिठुरता होगा।
इसीलिये जाड़े और बरसात को नहीं चाहता।
मैं समझ गया
किसी गरीब घर का बालक है।

मेरे साथ अक्सर ये होता है।
मैं साधारण प्रश्न कर, जान लेता हूँ
आदमी का, उसके घर परिवार का
पता लगा लेता हूँ वहाँ क्या होता है
जान लेता हूँ किसमें, कहाँ, कितना टोटा है।

जब भी मेरे साथ यह होता है
लोग मुझे कहते हैं-
यह शरलक होल्मस का पोता है।
लोग मुझे कहते हैं-
यह शरलक होल्मस का पोता है।

(1) इंगलैंड के, जासूसी कहानियों के जगत प्रसिद्ध कहानीकार, सर आर्थर कानन डॅायल द्वारा रचित उनकी लिखी गयी जासूसी कहानियों का जगत विख्यात नायक।

बेटी पराया धन नहीं होती

बेटी, पराया धन नहीं होती।
बेटी, कोई वस्तु नहीं, कोई चीज नहीं
जिसे रुपयों से तोलो।
वो अनमोल होती है।

हमारा अंग होती है।
एक सुन्दर गुडि़या होती है।
उसमें होता है एक मन
स्वच्छ, सुन्दर, निर्मल मन।
उसमें एक बहुत विशाल दिल होता है
दिल में भाव और प्यार होता है।
उसमें एक दिमाग होता है
जो स्थिति समझ सके, सच को पकड़ सके।
वो सोचती है, विचारती है,
हमारे घर को संवारती है
किलकारी से भर देती है।

फिर अपने घर को संवारती है,
किलकारी से भर देती है।
एक नया जीवन देती है।
बेटी, पराया धन नहीं होती।

ये नयी दुनिया शुरू करने वाली
कितनी सशक्त होती है,
कितनी सजीव होती है।
एक नया रूप देती है,
समाज को नया मोड़ देती है
सभ्यता का केन्द्र-बिन्दु होती है।
बेटी पराया धन नहीं होती।

शाकाहारी कुत्ते

दिखने में बड़ा था
ऊँचा कद, लम्बा शरीर
भारी आवाज़, सब मिलाकर
पीटर एक खतरनाक कुत्ता था
हमारे मुहल्ले के कु़त्तों का सरदार भी
सभी उसका रोब मानते थे
उसके पीछे दुम हिलाते थे।
हम सब बच्चे भी उसको मानते थे
जब कहीं आता दिखाई पड़ता
पता नहीं डर से या आदर से
सीधे खड़े हो जाते थे।
जब कुछ बदमाशी मन में होती
पता नहीं कैसे भाँप लेता था
घुर - घुर करता रास्ता रोक लेता था।

दिनभर-रातभर चौकसी करना - उसका यही काम था।
क्या मजाल कोई चोर उधर मुँह करे।
इतना ही नहीं आस पास के मुहल्ले वाले भी
सुरक्षित महसूस करते थे।

हम सभी को गर्व था
हमारे मुहल्ले में बाहर से चोर नहीं आया था
बाहर के चोर ने चोरी नहीं की थी।
हमारे मुहल्ले में कोई चोर नहीं था
अन्दर के चोर ने चोरी नहीं की थी।

एक दिन बहुत असाधारण बात हुयी
हम सब अचम्भे में यह कैसे हुआ।
पुलिस आयी और नुक्क्ड़, के मकान से
किरायेदार को पकड़कर ले गयी।
सुना गया उन्होंने गबन किया था
लाखों का गबन किया था
बैन्क को जमकर लूट लिया था।

हम सबने आपात कालीन मीटिंग बुलाई
चर्चा हुयी यह कैसे हुआ-
इतना बड़ा चोर, हमारे बीच
किसी को खबर भी नहीं
हमको न रही न सही
सूँघकर जान लेने वाले पीटर को भी नहीं?

बहुत विचार किया
कुछ समझ नहीं आया।
कुछ देर बाद
हम सब अपने-अपने घर चले गये।
प्रश्न हमारे साथ हमारे घर गया।
माँ से पूछा ऐसा कैसे हुआ ।
माँ बोली - शाम को देखना
पीटर कहाँ जाता है।?'

हमारी टीम फिर जुट गयी
दोपहर बाद से ही सारी खबर आने लगी
कब उठा, कब अँगड़ाई ली, किस ओर मुँह किया।
जब धुधलका हो चला
हमने देखा -
पीटर नुक्कड़, वाले घर पर था।
वो उसे रोटी नहीं
माँस, मछली दे रहे थे।

बात हम सब समझ गये
हम लोग बस रोटी देते हैं
ये लोग उसे बोटी देते हैं।
मसालेदार खाना देते हैं
मसाले की गन्ध नाक में भर जाती है।
सूँघने की शक्ति कम हो जाती है
पीटर कुछ बोलता नहीं
खड़ा हो दुम हिलाता है।

हमें विश्वास हो गया-
हमें अन्दर के चोरों को पकड़ना होगा
तो शाकाहारी कुत्तों को लाना होगा।

Wednesday, March 12, 2008

भविष्य से अतीत में

जब भी सोचता हूँ अपने बारे में
तो पाता हूँ
स्वयं को बँधा
अपने परिवार की
पीढि़यों की लड़ी में पड़ी
एक कड़ी सा,
जिसकी पहचान है, महत्व है
पिछली कड़ी को
अगली कड़ी से जोड़ने में।

एक तरफ हैं
मेरे माता और पिता ।
जब देखता हूँ उनको
उनमें छिपा एक चेहरा पाता हूँ
जाना पहचाना सा
वही माथा, आँख, नाक, होठ और ठोड़ी।
बिलकुल मेरी तरह।
क्या कहूँ इन्हें-
अतीत की निशानी या भविष्य का बिम्ब?
माना ये पिछली पीढ़ी के प्रतीक हैं
पर हैं भविष्य - मेरा अपना भविष्य
वह शायद ऐसा ही होगा।

दूसरी तरफ हैं मेरे बच्चे।
नन्हे, नादान, बाल क्रीड़ा में मग्न।
इनमें भी एक चेहरा छिपा है।
वही नाक, कान, आँख और होठ
वही आदत, शैतानी, वही मस्ती
याद दिलाते हैं मुझे
मेरा बचपन, मेरा अतीत।
ये कल की धरोहर हैं
हमारा भविष्य हैं ये लोग।
पर मैं तो देखता हूँ इनमें
अपना अतीत, बस अपना अतीत
बहुत कुछ ऐसा ही तो था।

इस अतीत और भविष्य की कड़ी में बंधा
सोचता रहता हूँ -
यह अतीत मेरा भविष्य है
और यह भविष्य मेरा अतीत।
समझ नहीं पाता-
हम अतीत से भविष्य में जा रहे हैं,
या भविष्य से अतीत में?

Tuesday, March 11, 2008

बालिका-भ्रूण हत्या

देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी ।

प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।

मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।

नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी ।

सब सीख उन्हें ये देगी, पालेगी-पोसेगी
तकलीफ अगर होगी, तो रात-रात जागेगी ।

इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।

पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं ।

वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।

अगर नहीं यह होगी, तो कल भोर नहीं होगी
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।

हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे
विश्वास मुझे है तब वो भी नहीं होगा ।

जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।
जिसके दम से तुम दम लेते हो दुनिया में

तब वो भी नहीं होगा-तब वो भी नहीं होगा।

बेटी की अभिलाषा

मैंने पूछा बेटी से अपनी
- बेटी! बता मुझे, तेरी अभिलाषा क्या है?'
कुछ सोचा उसने
फिर बोली मुझसे
वो तन के

- उन्मुक्त गगन में उड़ जाऊँ
नभ को छू लूँ , पंछी बन।
मैं डोलूँ बाघिन सी, निडर
जिस ओर चलूँ हट जायें सभी
रास्ता दें, झुक जायें सभी।
रण में डट जाऊँ लक्ष्मीबाई सी
रास्ता करलें वीर सभी।
आ जाऊँ कहीं जो राजनीति में
इन्दिरा गाँधी सी डट जाऊँ मैं।

नहीं चाहिये मुझको कुछभी
झुमका, चन्दन, बिंदिया, कंगन।
देना हो दे देना मुझको,
इतना बस वरदान प्रभू

जीवन मैं जी लूँ अपने ढंग से
लिख दूँ नये कानून नियम।
बालाऔं के मुँह से हट जायें
आँसू, रोना, चिन्ता की रेखाऐं सभी।
फिर कोई नहीं बोले इस युग में
"अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आँचल में दूध और आँखों में है पानी।"(1)


(1)राष्ट्र कवि आदरणीय स्वर्गीय श्री मैथली शरण गुप्त जी की रचना 'यशोधरा' से।

चिडि़या को मत बंद करो तुम

आओ बच्चों तम्हें सुनाऊँ।
एक कहानी बहुत पुरानी ।।
नन्हीं सी एक चिडि़या रानी।
मेरे घर में आती थी ।।

कूक-कूक कर मुझे बुलाती।
किलकारी से घर भर जाती ।।
मीठे सुर में गाना गाती ।
हम सब का वो दिल बहलाती ।।

जब भी उसका मन करता था।
बहुत दूर वह उड़ जाती थी।।
भूख लगी तो घर को आती ।
वरना वो बाहर रह जाती ।।

एक दिवस को नटखट चुन्नू।
जाल बिछा कर बैठ गया।।
चिडि़या को उसने पकड़ लिया।
पिंजड़े में फिर जकड़ दिया।।

चिडि़या अब मुश्किल में थी।
चुन्नू के कब्जे में थी ।।
गाना उसने बन्द किया।
अनशन पानी ठान लिया ।।

चुन्नू ने उसको ललचाया।
लड्डू पेड़े खाने को लाया ।।
चिडि़या बिलकुल बदल गयी थी ।
सूरत उसकी उतर गयी थी ।।

चिडि़या थी मन की रानी।
आँखों में था उसके पानी।।
मैंने फिर पिंजड़ा खोला।
चिडि़या को बाहर छोड़ा।।

फुर से चिडि़या निकल गयी।
दूर डाल पर बैठ गयी।।
पहले उड़ ऊपर को जाती।
फिर गोता मार नीचे को आती।।

मीठे सुर में गाना गाती।
मकारीना नाच दिखाती।।
कितनी खुश चिडि़या रहती।
जो मन आया वो करती।।

एक बात की सीख करो तुम।
चिडि़या को मत बन्द करो तुम।।
जितनी खुश चिडि़या होगी।
उतने खुश तुम भी होगे।।

चिडि़या को मत बन्द करो तुम।
चिडि़या को मत बन्द करो तुम।

बैलगाड़ी का कुत्ता

आपने देखा होगा
बैलगाड़ी के नीचे
किसी कुत्ते को चलते।
समझता है -
वो बोझा उठा रहा है
बैलगाड़ी का, उसे दिशा दे रहा है
ले जा रहा है- खेत से खलिहान, बाज़र, हाट तक
उसके बिना कुछ नहीं होगा
सब रुक जायेगा।

वो नहीं मानता - बोझ ढोते हैं बैल
दिशा देता है चालक, किसान।
ये सब भी बस निमित्त मात्र ही हैं
कर्ता हैं, रचयिता नहीं
साधन हैं, योजक नहीं।
कुत्ता मानता है - वही सब कुछ है।
कुत्ता ही सब कुछ है।

आपने देखा है चारों और - कितने कुत्ते हैं?
डरता हूँ कहीं मैं भी कुत्ता न बन जाऊँ।