Tuesday, June 27, 2017

आंग्ल देश की भाषा

मैं सोचता था-
आंग्ल भाषा बोली जाती है
दुनिया भर में
हर कोने में।

इसका प्रेमी तुमको दुनिया में
सभी जगह मिल जायेगा
इसको जानोगे तब ही कुछ पाओगे।

नहीं पता था मुझको लेकिन
आंग्ल देश के पश्चिम में
वेल्स नाम का प्रान्त है कोई
वहाँ पर इसको
नहीं जानता हर कोई
नहीं प्रेम है सबको इससे
नहीं बोलता हर कोई।

मैं अज्ञानी था
नहीं पता था मुझको बिलकुल
चिराग तले पर अन्धकार इतना होगा
जिसे नहीं जानता हर कोई
नहीं पता है सबको इसका
नहीं जानता हर कोई ।

दिये का धर्म

एक दिया
टिमटिमाता जल रहा था
घनी अंधेरी रात में
दूर कहीं वीराने में
किसी पेड़ के नीचे.

अँधेरे ने उससे कहा
-नाहक खून जलाते हो अपना
कौन है यहां जो तुम्हें देखे
तुम्हारी मदद ले, रास्ता ढूंडे.
पतंगों को जलाते हो
बस व्यर्थ जलते हो.
हवा का एक झोंका ही काफी है
किसी छंड़ भी मिटा देगा तुम्हें.
क्या मिलेगा तुम्हें?
वीराने में एक अंजान मौत!
न देखा किसी ने, न सुना.
तुम्हारे नसीब में नहीं
किसी आँख का कोई आँसू
बस है एक लावारिस मौत.
नाहक जलते हो तुम.

मेरी मानो
-तेल-बाती बचाओ
अपनी आँखें मूंद लो
चुप लगा कर सो जाओ.
आज बचोगे तो कल काम आओगे.

दिया बोला –
किस भ्रम में हो तुम?
सच क्यों नहीं कहते हो?
तुम मुझ से डरते हो !
कहीं पत्तियाँ, सूखी लकड़ियाँ आग न पकड़ लें
दावानल तुम्हारा अस्तित्व न मिटा दे.
तुम नहीं चाहते मैं अपना काम करूँ
बिना डरे, बिना भेद-भाव, निष्पक्ष.
दूर तक लोगों को रास्ता दिखाऊं
उन्हें तुम्हारे चुंगल से बचाऊं.

अरे अधर्मी – निर्लज्ज!
माना मैं अकेला तेरे लिये काफी नहीं
तुझे पूरी तरह हटा न पाऊंगा
पर तुझ पर चोट भरपूर करूंगा.
जब तक तेल-बाती है,
जरा भी जान है
अपना धर्म निभाऊंगा
- तुझ से लड़ूंगा.
तेरी बपौती न चलने दूंगा
तुझे चैन से नहीं रहने दूंगा
तुझ से जीत न पाऊंगा तो क्या
चोट तो पूरी करूंगा.
तेरा नुकसान बहुत करूंगा.

जब तक तेल-बाती है,
ज़रा भी जान बाकी है
मैं जलता रहूंगा.
तुझ से लड़ता रहूंगा

चाइल्ड लेबर

एकाग्र चित्त,
ध्यान मग्न
अपने काम में लीन है
हर रोज़ व्यस्त रहती है
सुबह से शाम तक
झाड़ू, पोछा, बर्तन
बच्चों की देखभाल
सब पूरे ध्यान से।

क्या करे?
परिस्थितियाँ विषम हैं
जिम्मेदारी अधिक है
अनुभव सात साल का है
उम्र बारह साल की है।

बालिका बचाओ, बालिका पढ़ओ

देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी ।
प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।

मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।
नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी।

सीख उन्हें ये देगी, ध्यान रखेगी, पालेगी-पोसेगी
तकलीफ अगर होगी, तो रात-रात जागेगी ।
इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।

पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं।
वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।

अगर यह नहीं होगी, तो कल भोर नहीं होगी
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।
हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे
विश्वास मुझे है कि तब वो भी नहीं होगा ।
जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।

जिसके दम से सब दम लेते हैं दुनिया में ।
तब वो भी नहीं होगा-तब वो भी नहीं होगा।

जीवन - मुट्ठी भर रेत

जीवन मुट्ठी भर रेत
डरता हूं फिसल न जाए
हाथ से निकल न जाए
जिंदगी की घडि़यां
ये सुंदर, मधुर, सुहाने क्षण।
कसकर पकड़ लेता हूं
मुट्ठी में जकड़ लेता हूं

यह फिसलने लगता है
पकड़ से निकलने लगता है।
तेजी से - और तेजी से।
डरता हूं कैसे रोकूं इसको
पकड़ ढीली होती है
यह नहीं फिसलता तेजी से
नहीं निकलता फुर्ती से
रहता है मेरे साथ ज्यादा देर
आनंदित करता है, सुख देता है।

मुझको विश्वास दिलाता है फिर से
जीवन है मुट्ठी भर रेत
बस मुट्ठी भर रेत

बच्चन जी की बात नहीं है बच्चों वाली

बच्चन जी की बात नहीं है बच्चों वाली
सर माथे पर अपने माना है उनको मैंने
कहा उन्होंने था, हम सबको बतलाया था -
"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती"

पर मैंने तो बचपन से देखा है, अब तक देखा है
खाली कोशिश ही करते रहने वालों की जीत नहीं होती
बस कोशिश ही करते रहने वालों की जीत नहीं होती

तुम बस कोशिश ही करते करते मत रह जाना
करना कोशिश हर बार मगर, रुक मत जाना
रस्ते में कांटे हों, पत्थर हों, तुम मत घबराना
नदियां हों, पर्वत हों या समुंदर तट का आ जाना
रोक न तुम को पाये बिजली, बारिष का आना

थक मत जाना, रुक मत जाना हार मान कर बैठ न जाना
यदि रास्ते में गिर जाओ कहीं तुम, मत घबराना
सम्हलना उठना, उठ कर फिर चल देना
मुश्किल हों कितनी भी, दूने उत्साह लगन से चलना
सम्हलना उठना, उठ कर फिर चल देना
ध्यान रहे, तुमको है मंज़िल पर ध्वज फहराना
गंतव्य ध्यान में रखना अपने, मत रुकना

याद रहे तुमको हर दम, तुम भूल न जाना 
"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती"
 
और दूसरी बात हमारी
ये भी अपने ध्यान में रखना 
मंज़िल पर हों गढ़ी हमेशा आंखें जिसकी
जीत हमेशा ही होती आयी है उसकी 

जीत हमेशा होगी उसकी
मंज़िल पर हों गढ़ी हमेशा आंखें जिसकी
मंज़िल पर हों गढ़ी हमेशा आंखें जिनकी

नदिया का पानी


कल-कल कल-कल
कल-कल कल-कल
बहता जाता पानी
नदिया का पानी
कल-कल कल-कल करता
बहता है पर्वत से
घाटी से बहता है
कल-कल कल-कल करता
अविरत बहता जाता है पानी

राह रोक कर खड़े हुये
पर्वत कितने ऊंच-ऊंचे
कहते हैं – हम हैं बलशाली
ऊंचे कितने, बरसों से प्रहरी हैं
रोक नहीं पाते वो उसको
वह जाता है रोज़ निरंतर
काट उन्हें, वो बहता जाता है
कहता जाता है
कल-कल कल-कल

पर्वत के पत्थर
आते हैं रस्ते में उसके
कहते हैं उसको
रुकजा हम हैं रस्ते में तेरे
राह रोक कर खड़े हुये 
तू थमजा, साथ हमारे रुकजा
पड़े वहीं रह जाते हैं पत्थर
कभी काटता वो उनको
कभी छांटता वो उनको
जाता है अपने रस्ते

ये इन्तजार में रहते उसके
सोचा करते -
वो कल रुक जायेगा
पर वह बहता जाता है
कहता जाता है
कल-कल कल-कल

तुम जब भी देखो
कोई रोड़ा, पत्थर कोई आये
राह तुम्हारी रोक खड़ा हो
बोले – रुक जाओ, थम जाओ
तुम जाना रस्ते पर अपने
हंस कर तुम उससे कहना
कल-कल कल-कल

Thursday, June 1, 2017

क्यों सोचते हैं हम?

कल एक पुराने दोस्त से
मेरी मुलाकत हो गयी
मुझे देख चौंक उठे
बोले – कैसे हो?
तबीयत ठीक है?

मैंने कहा – हां ठीक है
मज़े में हूं बस सोच रहा था कि ...
उन्होंने मुझे बीच में टोक दिया
आगे बोलने से रोक दिया
कहा – क्यों सोचते हो?
आखिर क्या बात है ?
तुम सोचते क्यों हो?

तुमने देखा है किसी पंछी को
हवा से बातें करते झूमते
मस्ती में अपनी धुन में गाते
किसी तितली देखा है उड़ते
किसी भंवरे को मंडराते देखा है
कोयल की कूक सुनी है

कभी देखा है किसी कुत्ते को
गाड़ी के पीछे दौड़ते
बिल्ली को चूहे से खेलते
खरगोश को छलांग लगाते
हिरण को भागते देखा है
बैल को काम करते
रहट से पानी खींचते देखा है
शेर को शिकार करते
मछ्ली को तैरते देखा है
कभी देखा है तुमने
किसी बच्चे को मस्ती करते

ये सब सोचते नहीं हैं
ज़िन्दगी के मज़े लेते हैं
ज़िन्दगी मज़े से जीते है
तुम नाहक परेशान होते हो
व्यर्थ सोचते हो
जिन्दगी का ढंग बदल दो
जिन्दगी खुल कर जी लो
सोचना बंद कर दो

मझे समझ आया
दुनियां में कितने जीव हैं
खुल कर जीते हैं
सोचते नहीं हैं
ये भी कितना सीधा आदमी
कितना अच्छा आदमी
सोचता नहीं है
मज़े से जीता है!

मैं फिर सोच में पड़ गया
ये सब मजे से जीते हैं
हम बेकार ही सोचते हैं?
क्यों सोचते हैं हम?

क्यों पूछा तुमने मुझसे?

क्यों पूछा तुमने मुझसे –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?

उठते – बैठते छवि तुम्हारी
आँखों में रहती है मेरे
तुम मेरी सांसों में हो
मेरे प्राणों में बसती हो
नहीं पता क्या तुमको ?
कितना प्यार मुझे है तुमसे?

फिर मुझसे क्यों पूछा तुमने –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?

कौन हो तुम?

कौन हो तुम
क्या संबन्ध है तुमसे?
किस जन्म का नाता है?
मैं नहीं जानता

बना रहता है चित्र तुम्हारा
मेरे दिल, दिमाग, मन पर
हर समय, हर पल

जब कुछ करता हूं
सोचता हूं –
तुम क्या सोचोगे?
क्या कहोगे?
क्या करोगे?
तुम खुश होगे या नाराज होगे?
बस यही सब सोचता हूं
जब भी कुछ करता हूं

तुम्हारा खयाल है
यही विचार हैं
कि रोक लेते हैं मुझे
गलत राह से बचाते हैं
सही राह पर चलाते हैं मुझे
कौन हो तुम?

कैसे बतलाऊं तुमको

कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं?
रहा साथ में इतने दिन से
नहीं पता तुमको फिर भी -
कैसा हूं मैं?
तुम्हीं कहो कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं?

तुमसे ही तो सीखा है मैंने -
सावन में झूले पर झूलो।
जाड़ों में भरी दोपहर
सूरज के आगे बैठो टांग पसारे।
बारिश में भीगो पानी में।
गर्मी में घूमो सुबह-शाम सागर तट पर।
बर्फ पड़े तो पर्वत पर जाओ
खेलो उसमें ढेले-ढेलों से।

तुमसे ही तो सीखा है -
डोलूं कैसे बगिया में
हाथों को हाथों में लेकर
झांकूं कैसे आंखों में आंखें डाले
देखूं कैसे उनमें तीनों लोकों को।

तुमसे ही तो सीखा है -
खेलूं कैसे बच्चों के संग
कैसे देखूं उनमें मूरत जगदम्बा की
कैसे रूप निहारूं उनमें भोले बाबा का।

तुमसे ही तो सीखा है मैंने -
मंदिर में जाओ शीश नवाओ
बस मंदिर में ही शीश नवाओ
बाकी सब के आगे झुकना मत
तनकर जीओ शीश उठाए।

तुमसे ही तो सीखा है इतना सब कुछ
क्या नहीं पता तुमको फिर भी
कैसा हूं मैं?
तम्हीं कहो - कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं।

उम्र का तक़ाज़ा

देखता हूं जब कभी मैं आइने में अक्स अपना।
दौड़ जाता है ज़हन में फिर मेरा गुज़रा ज़माना।।

बात ये उस वक्त की है जो यहां से गुजर गया।
मैं तो अब भी हूं वही बदल गया है पर ज़माना ।

शाम-रात, बारिश-पानी, जाड़ा-गर्मी कुछ भी नहीं थे।
था दौड़ता हर वक्त रहता, मैं गुनगुनाता नया तराना।

तब चाह थी दिल में लगी और जुनून तन में था जगा।
जोश था भरपूर मुझमें, हर रोज़ बनता था नया फसाना।।

जुनून अब भी है वही और चाह भी दिल में वही है।
जोश भी है दिल में मेरे, अक्सर गुनगुनाता हूँ तराना

पर अब हड्डियों में ज़ोर कम है पेशियों में दम नहीं है।
आईने में अक्स है और ज़हन में गुज़रा ज़माना।

अतीत, वर्तमान और भविष्य

समझ नहीं आता
किसे प्यार करूँ?

अपने अतीत को -
जो बीत गया
अब कभी वापस नहीं अयेगा?

अपने भविष्य को
जो आया ही नहीं
न मालूम कैसा होगा उसका स्वरूप?
फिर कैसे जानूं उसको?
कैसे ढालूँ कल्पना की परिधि में
कैसे ज्ञान करूँ, कैसे मान करूँ उसका?

इस त्रिकोण का तीसरा कोण है
अपना वर्तमान।
यह क्षणिक है , रुकता ही नहीं
बहता जाता है एक नदी की तरह।
यह तो अपने आप में एक पहेली है।

अतीत, भविष्य और वर्तमान
तीनों ही एक समस्या हैं
पर मेरी नहीं।
मेरी समस्या है -
इन तीनों में से एक को चुनना।

मैं वर्तमान को चुनता हूँ।
उसे प्यार करता हूँ
पाता हूँ अपने आप को
अतीत और भविष्य से मुक्त
न बीते हुए की खुशी , न शोक उसका
न आने वाले का डर।

मैं जीता हूँ - वर्तमान में
बस इस क्षण में।
प्यार करता हूँ इससे
जीता हूँ इस क्षण में।