Sunday, December 30, 2012

तुम कुछ करते क्यों नहीं?

गलत कहते हैं
सब गलत कहते हैं
जो लोग कहते हैं
वो लड़की मर गयी
दामिनी या अमानत कहते थे जिसे

ये नादान नहीं जानते
वो बस मरी है
गयी नहीं है कहीं
यहीं है हम सब के बीच
हमारे दिल में है छाप उसकी
दिमाग में है तस्वीर उसकी
रोम-रोम में बस गयी है वो
कानों में आवाज़ गूंजती है उसकी
बार-बार पूछ्ती है वो -

तुम कुछ करते क्यों नहीं
किस बात का डर है तुम्हें
क्या नहीं चाहते तुम
किसी और के साथ न हो
जो मैंने सहा था
फिर कुछ करते क्यों नहीं
किस बात का डर है तुम्हें

Saturday, December 29, 2012

शर्म करो

बंदर आपस में लड़ते रह गये और वो स्वर्ग चली गयी
कुछ मुंह शर्म से लाल हो गये कुछ पर कालिख पुत गयी
 

Thursday, December 27, 2012

कृष्ण! कहां हो तुम?


हे कृष्ण !
वो चीत्कार सुनी थी तुमने?
कहां थे तुम?
द्रोपदी अनाथ हो गयी
दुशासन जीत गया
दुर्योधन की आत्मा प्रसन्न हो गयी
रावण बहुत पीछे रहा गया

अब तो आ जाओ,
अपना सुदर्शन चक्र लिये
न्याय करो, आतताई को दंड दो
या भेज दो भीम और अर्जुन को
दुशासन की छाती फाड देंगे
उसकी भुजा उखाड़ फेंकेंगे
कर्ण की जीभ काट देंगे
दुर्योधन की जांघ तोड़ देंगे

भीष्म और द्रोण?
वो तो मौन थे, सदा की तरह 
कुरु सभा?
वो तो नपुंसक थी
मूक दर्शक थी
हमेशा ही ऐसी रही
वैसी ही रहेगी
ये सभी मौत के हकदार हैं
कौन देगा इन्हें?

कृष्ण! कहां हो तुम?
कब आओगे? 

Monday, December 24, 2012

जगो, जनता रोती है

कल गांधी के देश में
देश की राजधानी में
एक अनहोनी बात हो गयी
भयानक दुर्घटना हो गयी

कुछ दरिंदों ने एक अबला को धर दबोचा
कैसे कहूं क्या किया, क्या ना किया
वो रावण को पीछे छोड़ गये
दु:शासन से आगे बढ़ गये
मानवता शर्म से मर गयी,
दानवता भी रो पड़ी

जनता ने सुना, सकते में आ गये
सब सन्न रह गये
गर्म खून उबाल खा गया,
सड़क पर उतर गया  
हाकिमों को गुहार की
-    क्यों खून सर्द हुआ है तुम्हारा
जनता रोती है, तुम सोते हो?
क्यों नहीं कुछ करते हो ?

बड़ा दरोगा आगे आया
बोला –
हम हैं अहिंसा के सैनिक,
हम हैं गांधी के चेले
आंखों को हमने बंद किया है
कानों में उँगली हैं डाली
मुंह पर ताला लगा लिया है
बुरा नहीं कुछ सुनते हैं हम
बुरा नहीं हम देखा करते

मैंने माथा ठोका, सर पीट अपना
रोया, फिर बोला मैं –
इतने मति अंध नहीं हो तुम सब
      बस शत-प्रतिशत पथ भ्रष्ट हुये हो
      नहीं महात्मा के चेले तुम
तुम मदारी के बंदर हो
डमरू-डंडे पर छम-छम नाचोगे
चोर उच्चकों को छोड़ोगे
निर्दोषों को लाठी-गोली मारोगे
तुम सब तो केवल बंदर हो
बस बंदर के बंदर हो

हे प्रजातंत्र के रखवालों !
बंदरों पर काबू पा लो
लगाम कसो इन पर पूरी
पिंजड़े में इनको डालो
उस्तरे से काटी है नाक इन्होंने
कल ये गर्दन सब की काटेंगे
दु:शासन पर काबू पा लो
जनता रोती है, सहती है
आंखों से आंसू-आंसू गिरते हैं
पर फिर भी चुप रहती है

सैलाब उमड़ता आयेगा
सम्हलो, जनता की आवाज सुनो
जनता को समझो, पहचानो इनको,
दु:ख दर्द समझलो इनका
जितनी हो पाये, सेवा करलो 
वरना ढह जाओगे

जग जाओ, जग जाओ,
जनता रोती है तुम सोते हो?
अब तो जग जाओ