Saturday, February 7, 2009

चक्रव्यूह में अभिमन्यु

अतीत और भविष्य के बीच फँसा
आदमी रहता है त्रिशंकु सा
जानता नहीं किसे पकड़े-
अतीत को या भविष्य को?

अतीत बीत गया है
वापस नहीं आयेगा।
चला गया है हमेशा- हमेशा के लिये।
अब है तो केवल एक स्वप्न सा
आँख बन्द हो तो सामने है
आँख खुले तो अदृष्य, गायब ।

भविष्य भी अदृष्य है ।
पता नहीं क्या है आने वाले समय में।
उसे खोजना, उसके पीछे भागना व्यर्थ है
जैसे मरीचिका के पीछे भगना।
आँख बन्द हो तो दिखता है कल्पना में
आँख खुले तो गायब।

वर्तमान भी कम नहीं
बस भागता रहता है हर पल
एक दरिया सा बहता है निरंतर
थमता नहीं कि उसे देख सकें
परख कर सकें, पकड़ सकें उसे।
रोक पायें अपने दायरे में।

इन्हीं समस्याओं की त्रिविधा में फँसा आदमी
रह जाता है त्रिशंकु सा,
असमर्थ, निसहाय, अकेला।
जानता नहीं कि क्या करे?
किसे पकड़े? किसे रोक कर रखे?
कैसे निकल पायेगा इस चक्रव्यूह से ?

इस चक्रव्यूह से निकल पाता है
बस वही, जो जानता हो
कि निकलना नहीं है कभी
बस यहीं रहना है।
चक्रव्यूह में अभिमन्यु के समान
अपने मर्यादा चक्र में बंधे
अपना कार्म करते हुए
मोक्ष प्राप्त करना है।
बस यहीं रहना है
चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह।

पैसे का मोल

- लोग मुफ्त की चीज का
मान नहीं करते।'
ये बात वो लोग करते हैं
जो मुफ्त की चीज का
मोल नहीं जानते।

क्या आप नहीं मानते -
दुनियाँ में अच्छा है
जो कुछ भी अच्छा है
सब बस मुफ्त में है?

आपने कभी देखा है?
हवा को कहते -
'पहले पैसे दो, फिर साँस लो।'
इन नदी और झरनों को
बोलते सुना है -
'पानी मत पियो
पहले पैसे दो।'
आपने देखा है -
आकाश को पक्षियों से पैसे माँगते।
पेड़ को माँगते कीमत फल की
फूलों को सुगन्ध की ?

पैसा तो मात्र साधन है
इन्सान से इन्सान के व्यापार का।
व्यवहार का नहीं।
इसे इन्सान ने बनाया है
इसने इन्सान को नहीं।

बात छोटी सी है पर
यकीन नहीं होता ?
बचपन से आँखों पर
पट्टी जो है पैसे की।

पैसा नहीं आता बीच में
जब संबन्ध बनता है
एक आत्मा का दूसरी आत्मा से।
न आता है
आत्मा परमात्मा के बीच में।
वो!
हर बालक के जन्म पर
दिखा देता है - 'देखो यह खाली हाथ है'।
हर मृत के साथ दिखा देता है-
'यह भी खाली हाथ है'।
और साफ-साफ जता देता
पैसा तो बस हाथ का मैल है।
पैसा बस हाथ का मैल है।

स्वार्थ

कैसे होते हैं - माँ बाप
जो लाद देते हैं बोझा
अपने बच्चों पर,
अपनी कामनाओं का
जो पूरी न हो सकीं
और मर गयीं एक जवान मौत।

वे चाहते हैं कि
बच्चे जियें वह जिन्दगी
जो वो जीना चाहते थे
पर उन्हें न मिल सकी ।

इन मृत इच्छाओं के तले
बच्चे दब जाते हैं और
जीते हैं, लाश ढोते हुए।
उसके सड़न की बदबू
उनके नाक और दिमाग में भर जाती है
मार देती है
उनकी हर इच्छा
हर सपना नष्ट हो जाता है।
वो जीते हैं दिशाहीन नाव से
जो ढूँढती है किनारा
फिर अपने बच्चों पर
अपने मृत सपने लाद कर।

क्या यही देंगे?
विरासत में अपने बच्चों को -
ऐसी जिंदगी,
इच्छाओं को मार कर जीने का ढंग?

अच्छा न हो -
कि तोड़ दें हम यह कुचक्र?
और स्वतंत्र जीने दें अपने बच्चों को।
उनके अपने सपनों के साथ
उनकी अपनी दुनिया में।

त्याग

हम बचपन से
बुढ़ापे तक
एक बात सुनते आये हैं
त्याग ।
ये छोड़ दो इसके लिये ।
वो छोड़ दो उसके लिये ।
जीते हैं कुछ, बहुत कुछ छोड़कर।

न हम खुश होते हैं
न वो, जिसके लिये
छोड़ते हैं सब कुछ ।
हमें ललक रहती है - जो छोड़ा।
परेशानी न हो तो त्याग कैसा ?
वो बोझा ढोता है -
हमने त्याग किया, उसके लिये ।
क्यों छोड़ते हैं हम यह कुछ ?

अच्छा हो हम ऊपर उठें
इस अर्थहीन त्याग से ।
छोड़ दें -
द्वेष, बैमनस्य, बुराई और
अपने कुविचार ।

जियें खुद आराम से और
जीने दें सभी को - स्वतंत्र
बिना किसी बोझ तले दबे
स्वतंत्र जीने दें ।

सोना खरा होता है

तुम्हें देखकर - लगता है मुझे
वक्त बदला ही नहीं
थम गया है वहीं - जहाँ पर था कभी।

वही काले घने केश - वैसे ही हैं जैसे थे कभी
कुछ और निखार है
बादल में सुनहरी किरणें हों जैसे।

वही निश्छल, मधुर मुस्कान -चारों ओर खुशहाली फैलाती।
अपने अन्दर समाये हुऐ है
वही मोतियों की लड़ी - वैसी ही जैसी थी कभी।

आँख, भौं, पलक और चेहरे की दमक नहीं बदली
न बदली है होठ और गालों की लाली
समय से अछूते रह गये हैं सभी
जैसे समय ही थम गया हो वहीं - जहाँ पर था कभी।

बदला है तो बस
आँख के रास्ते दिखने वाला
मन और दिमाग का भाग
ये मजबूत हो गया है, पूरी तरह पक कर
जैसे मिट्रटी का बर्तन।
इसने अपना आकार बनाया है -
परिपक्व, अनोखा सबसे अलग।
अपना व्यक्तित्व गढ़ लिया है - अनूठा बेजोड़।

यह बता रहा है -
इसने अपने को तैयार कर लिया है
अडिग रहने को, तूफान कैसा भी हो

यह जान गया है -
तूफान आयेंगे - जायेंगे
जो बह जायेंगे, टिक नहीं पायेंगे।
जो रह जायेंगे - अडिग तपस्वी से
टिक जायेंगे अपना स्थान बना कर
फिर दूसरे तूफान का सामना करने को।

यह सब देखकर कितना अच्छा लगता है मुझे
लगता है किसी ने सच ही कहा है-
सोना तपता है, तो और खरा होता है।।

सभ्यता की पहचान

कचरे के ढ़ेर पर -
प्लास्टिक की थैलियाँ
भिनभिनाती मक्खियाँ
पास खड़ा कुत्ता
कचरे को कुरेदती
उसमें खाना ढूँढती
लाचार आखें
पास ही
लुका - छिपी खेलते बच्चे।

यह सब देखकर मैं समझ गया
मैं जंगल के बाहर आ गया हूँ
किसी शहर के पास हूँ।

अब जंगली लोगों का
कोई भय नहीं
मैं अब सभ्य लोगों के बीच हूँ।

मैं समझ गया-
मैं सभ्य लोगों के बीच हूँ।

दंगे

जब - जब दंगे होते हैं
हम नंगे होते हैं।
जब - जब दंगे होते हैं
हमारे ऊपर से
'समाज' की चादर
खींच ली जाती है।
हमारे 'सभ्यता' के कपड़े
नोच लिये जाते हैं।
हम नंगे हो जाते हैं

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जब - जब दंगे होते हैं
हम अपनी 'समाज' की चादर
फाड़ देते हैं।
अपने 'सभ्यता' के कपड़े
नोच कर उतार फेंकते हैं
नंगे हो जाते हैं

जब - जब दंगे होते हैं
हम नंगे होते हैं।

शाकाहारी कुत्ते

दिखने में बड़ा था
ऊँचा कद, लम्बा शरीर
भारी आवाज़, सब मिलाकर
पीटर एक खतरनाक कुत्ता था
हमारे मुहल्ले के कु़त्तों का सरदार भी
सभी उसका रोब मानते थे
उसके पीछे दुम हिलाते थे।
हम सब बच्चे भी उसको मानते थे
जब कहीं आता दिखाई पड़ता
पता नहीं डर से या आदर से
सीधे खड़े हो जाते थे।
जब कुछ बदमाशी मन में होती
पता नहीं कैसे भाँप लेता था
घुर - घुर करता रास्ता रोक लेता था।

दिनभर-रातभर चौकसी करना - उसका यही काम था।
क्या मजाल कोई चोर उधर मुँह करे।
इतना ही नहीं आस पास के मुहल्ले वाले भी
सुरक्षित महसूस करते थे।

हम सभी को गर्व था
हमारे मुहल्ले में बाहर से चोर नहीं आया था
बाहर के चोर ने चोरी नहीं की थी।
हमारे मुहल्ले में कोई चोर नहीं था
अन्दर के चोर ने चोरी नहीं की थी।

एक दिन बहुत असाधारण बात हुयी
हम सब अचम्भे में यह कैसे हुआ।
पुलिस आयी और नुक्क्ड़, के मकान से
किरायेदार को पकड़कर ले गयी।
सुना गया उन्होंने गबन किया था
लाखों का गबन किया था
बैन्क को जमकर लूट लिया था।

हम सबने आपात कालीन मीटिंग बुलाई
चर्चा हुयी यह कैसे हुआ-
इतना बड़ा चोर, हमारे बीच
किसी को खबर भी नहीं
हमको न रही न सही
सूँघकर जान लेने वाले पीटर को भी नहीं?

बहुत विचार किया
कुछ समझ नहीं आया।
कुछ देर बाद
हम सब अपने-अपने घर चले गये।
प्रश्न हमारे साथ हमारे घर गया।
माँ से पूछा ऐसा कैसे हुआ ।
माँ बोली - शाम को देखना
पीटर कहाँ जाता है।?'

हमारी टीम फिर जुट गयी
दोपहर बाद से ही सारी खबर आने लगी
कब उठा, कब अँगड़ाई ली, किस ओर मुँह किया।
जब धुधलका हो चला
हमने देखा -
पीटर नुक्कड़, वाले घर पर था।
वो उसे रोटी नहीं
माँस, मछली दे रहे थे।

बात हम सब समझ गये
हम लोग बस रोटी देते हैं
ये लोग उसे बोटी देते हैं।
मसालेदार खाना देते हैं
मसाले की गन्ध नाक में भर जाती है।
सूँघने की शक्ति कम हो जाती है
पीटर कुछ बोलता नहीं
खड़ा हो दुम हिलाता है।

हमें विश्वास हो गया-
हमें अन्दर के चोरों को पकड़ना होगा
तो शाकाहारी कुत्तों को लाना होगा।

अगला और पिछला काँच

मेरी पहली नौकरी लगी थी
बहुत खुशियाँ थी, उमंगे थीं
नौकरी पर जाने से पहले
घर में सब से मिलना था
आशीर्वाद ले, विदा लेना था।
सब से मिला, आशीष लिया
सभी ने अपना थोड़ा-बहुत ज्ञान दिया
ज्ञान का निचोड़ दिया।

डिग्री के घमंड में
कुछ सुना ही नहीं,
कुछ दूसरे कान से निकाल दिया।
एक बात मुझे घर कर गयी थी
याद रहती है हर दम
आज तक रास्ता दिखाती है मुझे
मेरे मामा ने कही थी।

मामा का ट्रक का व्यवसाय था
सगे बेटे सा गर्व था अपने ट्रक पर उन्हें
सगी बेटी सा दुलारते थे उसे।
मैं जब मिला, कहीं जाने को तैयार थे।
सीट पर, स्टेयरिंग पर सवार थे।
बोले -बेटा! आ बैठ।'
मैं बगल की सीट पर बैठ गया।
बोले - आस पास जो देखते हो
उससे सीख लेते हो या नहीं।'

मैं हँसा और बोला
'मामा! यह तो ट्रक है
ट्रक की अगली सीट है
इससे क्या सीख लूँ।'

बोले- बेटा! हँस मत
ट्रक की अगली सीट से दो सीख मिलतीं हैं
देखो यहाँ आगे देखने का काँच बड़ा है
पीछे देखने का काँच छोटा है
कुछ समझे या नहीं।'

मैने कहा - यह तो सत्य है
इसमें समझने को क्या है।'

वो बोले - इसका मतलब समझो।
आने वाले पर आँख जमाकर रखो
आगे आने वाला बहुत कुछ है
उसे देखो, परखो
गन्तव्य पर ध्यान लगाओ
दाँये-बाँये जाओ, रास्ता बनाओ
एक जगह अड़े मत रहो
अड़े के पीछे खड़े मत रहो
जब तक मंजि़ल नहीं आती आगे बढ़ो।
जो बीत गया उससे सीख लो
उसे छोड़ो और आगे बढ़ो।

याद रखो -
जितना बड़ा काँच उतना ज्यादा ध्यान
यह पहली सीख है ।

दूसरी सीख है -
अगर तुम जाग रहे हो
तो कहीं भी, कुछ भी सीख सकते हो
अगर सीखना चाहो तो।
आँख - कान खुले रखो
जो मिले सभी से सीख लो।
बेटा! जीवन सीखने का दूसरा नाम है
इसमें सीखना सबसे बड़ा काम है।'

फिर बोले-अब उतर जा, मुझे जाना है।
रब तेरा भला करेंगे।'

मैं उस दिन जब ट्रक से उतरा था
जिन्दगी की सही सीढ़ी पर चढ़ा था।
मैं अचम्भे में था -
कितना सीधा आदमी, कितना समझदार आदमी
कितनी गूढ़ बात, कितने सीधे शब्द।
और यह तीसरी बात भी
मैंने इसी घटना से सीखी थी।
जो कुछ भी कहो
सीधे, सरल शब्दों में कहो।
सब सीधे, सरल शब्दों में कहो।