Saturday, February 7, 2009

अगला और पिछला काँच

मेरी पहली नौकरी लगी थी
बहुत खुशियाँ थी, उमंगे थीं
नौकरी पर जाने से पहले
घर में सब से मिलना था
आशीर्वाद ले, विदा लेना था।
सब से मिला, आशीष लिया
सभी ने अपना थोड़ा-बहुत ज्ञान दिया
ज्ञान का निचोड़ दिया।

डिग्री के घमंड में
कुछ सुना ही नहीं,
कुछ दूसरे कान से निकाल दिया।
एक बात मुझे घर कर गयी थी
याद रहती है हर दम
आज तक रास्ता दिखाती है मुझे
मेरे मामा ने कही थी।

मामा का ट्रक का व्यवसाय था
सगे बेटे सा गर्व था अपने ट्रक पर उन्हें
सगी बेटी सा दुलारते थे उसे।
मैं जब मिला, कहीं जाने को तैयार थे।
सीट पर, स्टेयरिंग पर सवार थे।
बोले -बेटा! आ बैठ।'
मैं बगल की सीट पर बैठ गया।
बोले - आस पास जो देखते हो
उससे सीख लेते हो या नहीं।'

मैं हँसा और बोला
'मामा! यह तो ट्रक है
ट्रक की अगली सीट है
इससे क्या सीख लूँ।'

बोले- बेटा! हँस मत
ट्रक की अगली सीट से दो सीख मिलतीं हैं
देखो यहाँ आगे देखने का काँच बड़ा है
पीछे देखने का काँच छोटा है
कुछ समझे या नहीं।'

मैने कहा - यह तो सत्य है
इसमें समझने को क्या है।'

वो बोले - इसका मतलब समझो।
आने वाले पर आँख जमाकर रखो
आगे आने वाला बहुत कुछ है
उसे देखो, परखो
गन्तव्य पर ध्यान लगाओ
दाँये-बाँये जाओ, रास्ता बनाओ
एक जगह अड़े मत रहो
अड़े के पीछे खड़े मत रहो
जब तक मंजि़ल नहीं आती आगे बढ़ो।
जो बीत गया उससे सीख लो
उसे छोड़ो और आगे बढ़ो।

याद रखो -
जितना बड़ा काँच उतना ज्यादा ध्यान
यह पहली सीख है ।

दूसरी सीख है -
अगर तुम जाग रहे हो
तो कहीं भी, कुछ भी सीख सकते हो
अगर सीखना चाहो तो।
आँख - कान खुले रखो
जो मिले सभी से सीख लो।
बेटा! जीवन सीखने का दूसरा नाम है
इसमें सीखना सबसे बड़ा काम है।'

फिर बोले-अब उतर जा, मुझे जाना है।
रब तेरा भला करेंगे।'

मैं उस दिन जब ट्रक से उतरा था
जिन्दगी की सही सीढ़ी पर चढ़ा था।
मैं अचम्भे में था -
कितना सीधा आदमी, कितना समझदार आदमी
कितनी गूढ़ बात, कितने सीधे शब्द।
और यह तीसरी बात भी
मैंने इसी घटना से सीखी थी।
जो कुछ भी कहो
सीधे, सरल शब्दों में कहो।
सब सीधे, सरल शब्दों में कहो।

No comments:

Post a Comment