Thursday, May 23, 2013


तमाम उम्र साये की तरह कोई भी मेरे साथ न रहा.
किसी से उम्मीद क्या रखूं साया भी मेरे साथ न रहा.

Saturday, February 23, 2013

अब जो होगा अच्छा होगा

टूटी सड़क
बिना बिजली का खम्बा
गन्दा पानी भरा गड्रडा
बदबूदार दूषित हवा
दूर तक अन्धकार
घोर अन्धकार
ऊपर से घना कोहरा।

हाथ को हाथ नहीं सूझता
हाथ को हाथ नहीं सुहाता
झपट कर छीन लेता है
कूड़ा-कचरा जो कुछ हो।

आदमी दुशमन है आदमी का
चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या
सब होता है यहाँ
व्यापार की तरह।
बस व्यापार नहीं होता
ठप हो गया है।

स्कूल कालेज शान खो चुके हैं
बाकी सब मान खो चुके हैं।

मैं हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ।
खुश हूँ।
हर बुरी बात पर खुश हूँ
सोचता हूँ - इससे बुरा क्या होगा
अब जो होगा अच्छा होगा''


[1] उन शहरों की दुर्दशा पर जो कभी बहुत सम्पन्न होते थे।

Friday, February 8, 2013

डौली

छीन लिया क्यों तूने हमसे
क्यों डौली को तूने दूर किया
क्या भूल हुई कुछ हमसे थी
वो भोली गुड़िया छोटी थी
हम सब को कितनी प्यारी थी

लगता है तुझको भी प्यारी थी
उसको तू मिस करता था
दूर नहीं रह पाया उससे
वापस जल्दी बुला लिया

कैसे कुछ बोलूं
क्या अब बोलूं तुझको मैं
अहसान रहा तेरा हम पर
कुछ दिन जो उसको साथ किया
पास में तेरे है अब वो
तू खुश है वो खुश है


हम जैसे भी हो कर लेंगे
यादें उसकी रख लेंगे
धीरज मन में धर लेंगे
 
साथ में तेरे है अब वो
पास में तेरे है अब वो


- डौली के लिये जो अब भगवान के पास है