Friday, September 23, 2011

झूंठ को अपनायें

झूंठ कितना प्यारा होता है
हसीन दिलकश जांनशीन होता है
छुपा देता है सच को
परदे में रखता है
सामने आने से रोक देता है
जितना चाहें दिखाता है
बाकी अपने में छिपा लेता है

सच ना जाने कैसा हो
कड़वा, भयानक, डरावना, घृड़ित
ना जाने कैसा हो
हम डर जायें?
सहम जायें?
ग़म से मर जायें
न जाने हम क्या कर जायें
अगर सच के सामने आ जायें

मेरी माने सच को रहने दें
झूंठ को अपनायें
ये कलयुग की संजीवनी है
इसे पनपायें बढायें
बस झूंठ को अपनायें

क्यों पूछा तुमने मुझसे

क्यों पूछा तुमने मुझसे –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?


उठते – बैठते छवि तुम्हारी
आखों में रहती है मेरे
तुम मेरी सांसों में हो
मेरे प्राणों में बसती हो
नहीं पता क्या तुमको ?
कितना प्यार मुझे है तुमसे?

फिर मुझसे क्यों पूछा तुमने –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?

हमने क्या सूरत पाई है

हमने जो सूरत पाई है, न जाने कैसी पाई है
जो भी हमको देखता है, गधा हमको समझता है

दिया तुमने सभी को, ना जाने क्या क्या कुछ
मगर यही मंज़ूर तुमको था, यही किस्मत हमारी है

गिला है न शिकवा कोई, जो मिला कबूल हमको है
बस एक दुआ हमारी है, बाली से बड़ा वरदान हमको हो

मुकाबले में जब कभी कोई भी हमारे सामने हो
आधा नहीं पूरा गधापन हमारा उसी के सिर हो

सन्नाटा है, अब यहां चोरी नहीं होती

कुत्ता भौंकता है
वो सो नहीं पाता
दिन – रात जागता है
पड़ा सोचता है
कुत्ता क्यों भौंकता है ?

शायद कुत्ता नहीं जानता
वो दिन गये जब चोर आते थे
रात को दबे पांव आते थे
कोई आहट न हो, घबराते थे
कुत्ते भौंकें तो भाग जाते थे
लोगों की जाग से डरते थे
पकड़े जाने पर पिटने का खतरा था
चोर मीनार पर लटकायेंगे
जनता में बदनामी होगी, डरते थे
चोरी कभी-कभी करते थे
सबसे डर कर, छुपकर रहते थे

हवा बदल गयी है अब
चोर नहीं आते यहां,
बस डाकू बसते हैं
दिन दहाड़े डाका डालते हैं
थाने में डाके की रपट नहीं होती
डाकू को कभी सज़ा नहीं होती

डाकू किसी से नहीं डरते
कुत्तों के भौंकने से खुश होते हैं
अच्छा है लोग जाग जायेंगे
उनका लोहा मानेंगे, बड़कर स्वागत करेंगे
आने का नज़राना, जाने का शुक्रिया देंगे
यकीन है उन्हें, पकड़ में नहीं आयेंगे
आये भी तो छूट जायेंगे
अपने बच्चों को सिखाते हैं
जो मन आये कर लो
जब चाहो जितना लूट लो

लोग चुप हैं, सहमे रहते हैं
सन्नाटा है हर ओर
अब यहां चोरी नहीं होती
बस डाके पड़ते हैं
कोई चोर नहीं है यहां
कभी चोरी नहीं होती

दमकता दिया

रात का समय था
चारों ओर अंधकार था
आसमान पर बदली थी,
रोशनी का सुराग न था

गंतव्य पर हमारा ध्यान था
हमें समय का ख्याल था
वो हाथ से फिसल रहा था
इसका पूरा अहसास था

दिमाग छुट्टी पर था
हमारा मन बेकाबू था
हम रास्ता जानते थे
मगर राह खो बैठे थे

तभी कहीं दूर कुछ दिखा
वो हमसे बहुत दूर था
ठीक से नहीं दिखा था
हमें बाद में पता चला
टिमटिमाता दिया था

उसमें तेल कम था
हवा तेज चल रही थी
उसकी लौ कांप रही थी
मगर हौसला बुलंद था

उसे हालात का ज्ञान था
छोटे होने का अहसास था
वो पूरी रात न चल पायेगा
न जाने कब बुझ जायेगा
हमेशा के लिये सो जायेगा
वो यह सब जानता था


वो खुद को खो रहा था
हमें रास्ता दिखा रहा था
बराबर लगातार जल रहा था

हमारे काफिले में वो कौन थे
किस तरह के, कहां के लोग थे
न जाने किस कुंठा से ग्रस्त थे
दिये में कमी खोज रहे थे

उसकी रोशनी में कमी थी
उसमें घी नहीं, तेल जलता था
वो मट्टी का बना था
सभी को बता रहे थे

सूरज से तुलना कर रहे थे
उसे छोटा और तुच्छ बता रहे थे
कहां सूरज का दमकता प्रकाश
कहां वो पिद्दी सा दिया
वो उसका काम क्यों करता है?
बार-बार यही पूछते थे

मैं ये सब देखता था
अचम्भे में सोचता था

कैसे लोग हैं अजीब लोग हैं?
दिखती राह नहीं चलते
सही राह नहीं चलते
दिये से कुछ सीखते नहीं हैं
वो इनके लिये जलता है
ये बेकार उससे जलते हैं
अजीब लोग हैं, ये कैसे लोग हैं?

Saturday, March 19, 2011

पत्थर के पत्थर रह जाओगे

नन्हीं बच्ची
है कितनी अच्छी
जो बोल पडी थी मुझसे आज
- क्यों भेजी तुमने बात पुरानी
आज नहीं क्यों लिखते हो
मुझको तो अब लगता है
तुम काम नहीं कुछ करते हो

मैं सोच मैं डूबा बैठा हूं
हम सब क्या करते रहते हैं?

जो पहले देखा दोहराया
जो रट रख्खा था उगला दिया
कल तक हम जो करते थे
बस आज वही फिर करते हैं
दिन महीने साल न जाने कितने
बेकार में यूंही निकल गये
हम जैसे थे वैसे ही बने रहे
नया नहीं कुछ सीखा हमने
नया नहीं कुछ बोला हमने

वो देखो वो पत्थर
वो वर्षों से यहां पडा
जाडा गर्मी सरदी बारिश
सदियां की सदियां निकल गयीं
बदल नहीं कुछ इसमें पाया

क्या अंतर है हम दोनों में?
क्या इसको जीना कहते हैं?

एक बात की गांठ करो तुम
रोज नया कोई काम करो तुम
नया नहीं कुछ कर पाओगे
पत्थर के पत्थर रह जाओगे

झमेले के बंदर

नन्हीं कली मुझको मिली
हँस के कहा – तुमने सुना
मैंने कहा – नहीं, कुछ भी नहीं

नन्हीं कली मुझको मिली
हँस के कहा – तुमने देखा
मैंने कहा – नहीं, कुछ भी नहीं

नन्हीं कली मुझको मिली
हँस के कहा – तुमने कुछ कहा
मैंने कहा – नहीं, कुछ भी नहीं

उसने कहा – नहीं नहीं क्यों नहीं?
देखा नहीं, सुना नहीं, कहा नहीं
क्यों, क्यों, क्यों, क्यों नहीं?

मुझको पूरा भरोसा है
गांधी के तुम चेले नहीं
अब तो ऐसा लगाता है
तुम भी झमेले के अंदर हो
तुम तो बिलकुल बंदर हो

अपना चशमा बदल के देखो

छोटी बच्ची चहक उठी
चटक मटक कर बोली मुझसे
अॅं कल मेरे! क्या करते हो
कमरा तुमने बंद किया है
कुर्सी पर अकडे बैठे हो
दूर बहुत हो सब लोगों से
कोई बात नहीं तुमसे करता है
मिलने में भी डर लगता है
इस तरह अकेले बैठे ठाले
क्या मिलता है तुमको बोलो

मैं चुप, बिलकुल चुप था
सोच रहा था क्या बोलूं
ये बात पते की बोल रही है
कड़वा सच भी घोल रही है
इतने सारे लोग यहां हैं
भूख प्यास की फिकर नहीं है
घर जाने की किसको चिंता
चौबीस घंटे लगे हुए हैं

मुस्काई गुडिया
फिर बोली मुझसे –
कमरा छोड कर अंकल निकलो
बाहर जा कर सबको देखो
मिलकर उनके साथ में खेलो
कंधे से कंधा टकराओ
जोश में उनको लेकर आओ
हंसकर उनसे बात करो तुम
गलती सब की माफ करो तुम
गुस्सा बिलकुल करो नहीं तुम
हिल मिल कर सब साथ रहेंगे
मिल जुल कर सब काम करेंगे
झट पट - झट पट खत्म करेंगे

काम सभी फिर और करेंगे
प्यार भी तुमको और करेंगे
काम समय पर खत्म भी होगा
सबके दिल में खुशी भी होगी
नाम भले ही भूल वो जायें
काम हमेशा याद रखेंगे

मैं असमंज में सोच रहा था
सही गलत को तोल रहा था

गुड़िया ने दुविधा समझी
प्यार से मुझसे फिर बोली -
अंकल मेरे मान भी जाओ
कमरे से बाहर तो आओ
हंस कर सबको गले लगओ
चशमा अपना साफ करो तुम
नयी नजर से देखो अब तुम

मैंने उसकी बात को माना
कमरे से बहर मैं आया
चशमा अपना दूर किया
नयी नजर से देखा सब कुछ
हिला दिया फिर अंजर पंजर
बदला गया तब सारा मंजर
सबने मिल कर काम किया
खुशी – खुशी हर रोज किया
जल्दी जल्दी खत्म किया
नैया अपनी पार लगी तब
मंजिल को पाया सबने
उनको खूब सराहा सबने

अब जाने की बारी आयी
बार-बार मैं सोच रहा हूं -
कैसे दूं मैं तुम्हें विदाई?
क्या बोलूं?
क्या बांधूं के रख दूं साथ तुम्हारे?

गुड़िया फिर से नजर में आई
एक बात फिर जहन में आई
जो कुछ सीखा मैंने तुमसे
मैं वापस तुमको भेंट करूंगा

यह तोहफा मेरा साथ में रखना
कान खोल कर ध्यान से सुनना
तुम भी जब फंस जाओ कहीं पर
मेरी बातें ध्यान में रखना
काम सभी के साथ में करना
चशमा अपना बदल के रखना
नयी नजर से देखा करना
बस अपना चशमा बदल के रखना
चशमा अपना बदल के रखना