Sunday, February 24, 2008

नियति और नीयत

नियति में क्या बन्द हमारी
मालूम नहीं हमको कुछ भी ।
घबराहट है, डर लगता है ।
पर होता वही है -
जो नियति में है बन्द हमारी ।

नीयत का मालूम हमें है ।
अंदर चलती बात पता है ।
क्या लेना, क्या देना किसको
सब बातों की बात पता है ।

इन दोनों में अन्तर इतना -
नीयत अपनी शक्ती में है ।
नियति पर चलती उसकी है ।

नीयत को यदि साफ रखोगे
नियति में बरकत होगी ।
नीयत में यदि खोट रहेगा
नियति में भी खोट लगेगा ।

इसीलिये मैं कहता हूँ -
नीयत अपनी साफ रखो
सीधा सच्चा काम करो
उसका भी कुछ नाम कहो।
चिन्ता कैसी ? चाह नहीं हो ।
होना हो, हो जाये वही फिर
नियति में जो बन्द हमारी ।
नियति में जो बन्द हमारी ।

मेरा सारथी

आज तक देखा नहीं है
पर है चित्र उसका
साथ हरदम
पास मेरे
मन के भीतर।

ध्यान उसका धर अगर लूँ
नमन कर उसको बुलाऊँ -

पास मेरे आके हरदम
साथ मेरे वो चला है।
समस्या कोई खड़ी हो
समाधान मुझको मिला है।
धैर्य की जब - जब कमी थी
हौसला मुझको मिला है।
चैन खोकर जब कभी मैं
घबरा गया था राह में,
हाथ मेरा हाथ लेकर
साथ मेरे वो चला है ।

पार्थ स्वयं को,
मानता बिलकुल नहीं हूँ
न पार्थ सी सामर्थ्य मुझमें ।
पर सारथी मेरा वही है।
पार्थ के जो साथ में था।
युद्ध में औेर शान्ति में
साथ मेरे वो रहा है।

ध्यान उसका धर अगर लूँ
नमन कर उसको बुलाऊँ -
पास मेरे आके हरदम
साथ मेरे वो चला है।
साथ मेरे वो चला है।

डाक्टर लालू का नुस्खा

रेल चली है मेल चली है
सब को साथ में लेकर अपने
कितनी तेजी रफ्तार चली है

फटेहाल रहती थी पहले
टक्कर यहाँ हुयी थी इसकी
वहाँ गिरी थी धक्का खाकर
पैसे सारे खत्म हुऐ थे
घाटे का सौदा लगती थी।

बड़े डाक्टर ने बतलाया था
बुढ़ा गयी है अब ये बिलकुल
मोटी भी कितनी लगती है
काट छाँट कर छोटा करलो
वज़न गिरा कर आधा करलो।
कड़वी घुट्टी धरी सामने
बोला इसको झटपट पी लो
शायद ही यह बच पायेगी
वरना जल्दी मर जायेगी।

डाक्टर बड़ा काबिल था लेकिन
शहारों में पल कर आया था
नहीं ज्ञान था उसको बिलकुल
गरीब बेचारे कैसे रहते हैं
कितना रेलों पर निर्भर हैं।
रोटी कपड़ा तेल पानी सब कुछ
ये ही ले जाकर देती है उनको
नहीं रहेगी कल जब यह तो
वो क्या खायेगा, क्या पीयेगा
कैसे फिर वह रह पायेगा।
तभी परिवर्तन की लहर उठी
माता का दरबार लगा
मनमोहन ने कमर कसी
गरीब मसीहा को वो लाये
बोलो– देखो इसको सम्हालो
फिर से जीवन तुम डालो"।
लोगों ने देखा हँसकर बोला–
कितना अच्छा योग बना है
चाल को देखो समझो पहचानो
एक तीर से दो को मारो
ये डूबेगी इसको लेकर
खेल खत्म दोनों का होगा"।

ये डाक्टर था बड़ा अनूठा
उसने देख परख कर समझ लिया
नब्ज़ पकड़ पहचान लिया
बोला–
साथ चलेंगे साथ रहैंगे राष्ट्र प्रगति के पथ पर सब
रेल बढ़ेगी राष्ट्र उठेगा तब खुशहाल बनेंगे सब।"

मूल मंत्र फिर बदल दिया
बाजी को उसने पलट दिया।
बोला– जितना चाहे खर्च करो
बस दौड़ो भागो तेजी से हरदम
नयी जवानी आ जायेगी।
कीमत अपनी कम कर दो
गरीब को राहत दे दो
नेक दुआएं मिल जायेंगी
आमदनी भी बढ़ जायेगी।''

सब के सब सकते में थे
– क्या संभव है यह?
पर सब खुश भी थे।
नहीं पिलायी इसने घुट्टी
काट छाँट भी नहीं करी।

सो धीर धरी सबने मन में
और मिल जुलकर फिर काम किया
जैसा बोला इसने वो मान किया।
सब कुछ बदल गया तब
घटी कीमतें, मिलीं दुआएं, बढ़ा मुनाफा
लक्ष्मी जी ने वास किया।
दुनिया में सबसे अव्वल नम्बर से
सभी इम्तहानों को पास किया।

अब काया इसकी पलट गयी है
दुनियाँ भर से सब आते हैं
प्रोफेसर से सीख यही लेकर जाते हैं
– रेल मेल की भाषा है रेल मेल की बोली है
रेल मेल चलाती है रेल मेल बढ़ाती है
खुशहाली फैलाती लाती है।
मूल मंत्र है सीधा साधा-
कीमत अपनी कम कर लो
वजन उठाओ ज्यादा से ज्यादा
दौड़ो भागो तेजी से हरदम।
भला गरीबों का हो जिसमें
ऐसा ही कुछ काम करो
ऐसा ही बस काम करो।।

फर्ज़ और क़र्ज़

क़लम का तक़ाज़ा है -
हक़ीकत बयाँ करूँ।
तेरा ये क़र्ज़ है -
दिलकश ज़ुबां कहूँ।

क़र्ज़ और फर्ज़ में तकरार हो,
तो ये हक़ अदा करूँ ।
बेशक, सर हो क़लम तो हो,
क़लम को न क़लम करूँ ।

परिचारिका

विमान की परिचारिका
फिल्मी तारिका से कम नहीं
आस्मान पर उड़ती है
पर ज़मीन पर चलती है।

सभी की देखभाल
अन्नपूर्णा का काम
हर समय अपने पैरों पर खड़ी
बिना किसी के सहारे अपने भरोसे
दुनिया घूमती है दुनिया देखती है
दुनिया को साफ दिखती है -
किसी का सहारा न लो
अपने पैरों पर खड़े हो
बन – ठन कर रहो, पर तन कर रहो
हौसला सातवें आस्मान पर हो
दुनिया छोटी है मुश्किल नहीं
अपनी मु्ट्ठी में कर लो
बस अपने सहारे से रहो ।

आँगल देश की भाषा

मैं सोचता था-
आँगल भाषा बोली जाती है
दुनिया भर में
हर कोने में।
इसका प्रेमी तुमको दुनियाँ में
सभी जगह मिल जायेगा
इसको जानोगे तब ही कुछ पाओगे।

नहीं पता था मुझको लेकिन
आँगल देश के पश्चिम में
वेल्स नाम का प्रान्त है कोई
वहाँ पर इसको
नहीं जानता हर कोई
नहीं प्रेम है सबको इससे
नहीं बोलता हर कोई।

मैं अज्ञानी था
नहीं पता था मुझको बिलकुल
चिराग तले पर अन्धकार इतना होगा
जिसे नहीं जानता हर कोई
नहीं पता है सबको इसका
नहीं जानता हर कोई ।

विमान परिचर

हवाई जहाज में उड़ता हूँ मैं
पर नहीं उड़ाता उसको मैं।
खाना सबको खिलवाता हूँ
पर नहीं उड़ाता उसको मैं।

हवाई जहाज के हर बन्दे का
ध्यान मुझे बस रहता है
उनकी हर आज्ञा मंजूर मुझे है
और नहीं उड़ाता उसको मैं।

पाइलट तो बस ध्यान मग्न है
गन्तव्य पर पहुचाना सब को है
और नहीं कुछ ध्यान में उनके
फिर भी नहीं उड़ाता उनको मैं।

सोच रहे हो -
क्या करता हूँ ?
कौन हूँ मैं ?

हवाई जहाज में काम मैं करता
विमान परिचर कहलाता हूँ मैं
इसका सब कुछ मेरा कार्य क्षेत्र है
पर नहीं उड़ाता उसको मैं।

आखिर क्यों?

बहुत खुश था मैं
कल उनसे मेरी मुलकात होनी थी।
बहुत ज्यादा खुश था मैं
कल उनसे मेरी बात होनी थी।
बहुत गर्म जोशी से मिला था
तहे दिल से स्वागत किया था उनका।

मैं खुश था
उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी
बहुत प्रेम भावसे मिले थे मुझसे।
मैंने पूछा - कैसे हैं?
उन्होंने कहा - कैसे हो?
मैं खुश - उन्होंने पहचान लिया मुझे !
आखिर भूलते कैसे
सुबह शाम का साथ था
बहुत करीब का रिश्ता था हमारा।

मैंने बात शुरू की
जहाँ छोड़ी थी बरसों पहले।
उनके चेहरे का भाव बदल गया।
मैं पढ़ नहीं पया उसे -
वो भूल गये थे मुझे ?
न पहचानने की कोशिश ?
न जाने क्या ?

मैं सकते में था
रंग - रूप में परिवर्तन -
बीते दिनों के अनुपात में पूरा।
रंग - ढ़ंग में परिवर्तन -
बिना किसी अनुपात में पूरा।
आखिर क्यों?

मैं बरसों बाद भी वहीं खड़ा था
वो बदल गया था
आखिर क्यों ?

Tuesday, February 19, 2008

कर्मों का लेखा होगा

गाता था हँसता मुस्काता था हरदम
कहकहों की गूँज लगाकर
हर महफिल की शान बना रहता था
लगता था - कल था ये
कल फिर होगा
खुश ही रखेगा सबको
ज्ञान ध्यान की बात बताकर
अपने अनुभव का मंथन कर
कुछ मूल मंत्र यह दे जायेगा।

क्या मालूम? पता था किसको?
यह लेटा होगा आज धरा पर
चुप बिलकुल शान्त पड़ा सोयेगा
अश्रु भरी आँखें होंगी सब की
जो भी मिलने आया होगा
महफिल में सन्नाटा होगा।

है मालूम पता है सबको
पूजा होगी मंत्र जाप तर्पण होगा
फिर अग्निदेव को देकर उसको
सब अपनी राह निकल जायेंगे

है मालूम पता है सबको
इस धरती पर फिर
ईशदेव होंगे, कर्मों का लेखा होगा
नहीं साथ में कोई होगा
बस कर्मों का लेखा होगा।

फौजी बाप

मैं मिला हूं
एक बूढ़े आदमी से।
उसने अपने बड़े लड़के को
फौज में भेजा था
जब वह लड़ाई में शहीद हो गया
तब दूसरे को फौज में भेज दिया था।

मैं अचम्भे में-कैसा आदमी है?
पूछ बैठा-यह आपने क्या किया?
पहला लड़का काम आ गया
तो दूसरे को झोंक दिया?
अगर इसको कुछ हुआ
भविष्य में आपको कौन देखेगा?
पितरों का तर्पण अर्पण कौन करेगा?

उसने मुझे देखा, बहुत प्यार से कहा-
मैंने एक को युद्ध में भेजा था
वो शहीद हो गया
उसकी जगह खाली हो गई
तो दूसरे को भेज दिया
भाई का अधूरा काम पूरा करेगा
दुश्मन को मार भगाएगा
देश की रक्षा करेगा
हम सब चैन से रहेंगे।

अगर कोई भी बाप अपने बेटे को
फौज में नहीं भेजेगा
दुश्मन हावी हो जाएगा
कोई भी बाप जिन्दा नहीं बचेगा।
सोचा बहू-बेटियों का क्या होगा?
मुझे भविष्य की चिन्ता है
इसलिए ही मैंने बेटे को फौज में भेजा है।

Friday, February 8, 2008

जंगल में पेड़

जंगल में पेड़ों को देखो
शहरों में लोगों को देखो
जो सीधे साधे होते हैं
पहले कटे जाते हैं।