गुरुवार, 30 जुलाई 2026

जैन-ज़ी सब-कुछ देख रही है

तुमने भी तो देखा होगा 
जंतर – मंतर पर जमा हुए थे 
कितने सारे तिल चट्टे थे 
नंग धड़ंग वो नाच रहे थे 
जब चाहा जिसको नोच रहे थे 
धर्म, सभ्यता, संस्कार?
वो यह सब तो भूले बैठे थे 
बस मांग रहे थे आजादी 

सम्पूर्ण विश्व में पर जाकर देखो 
नहीं मिलेगा तुमको 
दूजा कोई देश जगत में 
जिसमें खुल कर गाली दो 
खुले मंच से भरी सभा में गाली दो
जब जी चाहे जिसको गाली दो
ऐसी वैसी जैसी चाहो गाली दो

सीएम, पीम को गाली दो
सेना के वीर जवानों को गाली दो
लोक तंत्र को खुलकर गाली दो
लाल किले पर चढ़ जाओ 
सड़कों पर आओ शोर मचाओ 
नंगा नाचो गाओ और नहाओ 
फिर जोर जोर से चिल्लाओ 
- आजादी, हमें चाहिए आजादी 

इससे ज्यादा कहाँ मिलेगी आजादी 
और बचा है करने को अब क्या ?
दिल में इच्छा क्या है करने की ?
लूटमार, आगजनी और खून करोगे?

तुम सब जिसको मांग रहे हो 
बतलाओ कैसी होगी वो आजादी
इससे ज्यादा खुल कर और कहाँ पर 
क्या-क्या, कैसे करने की सोच रहे हो?
तुम कैसी आजादी मांग रहे हो? 
बतलाओ तुम क्या मांग रहे हो?

समझ गया, मैं समझ गया
सोच तुम्हारी समझ गया
देख लिया है मैंने अब तो 
सीमा पार तुम्हारे आकाओं को 
नाच रहे हो तुम सब कठपुतली हो 
नहीं पता क्या तुमको कैसे हैं वो?
उन्हें चाहिए बर्बादी, केवल बर्बादी

तुम नाच रहे उनकी उंगली पर 
वो पैसा देते हैं, तुम्हें नचाते हैं 
सपनों की दुनिया में तुम्हें घुमाते 
धर्म, संस्कार, सभ्यता तुम भूल गए 
निकाल पड़े और यहाँ मचाते बर्बादी?
नहीं-नहीं हम नहीं मचाने देंगे तुमको 
यहाँ किसी तरह की कोई भी बर्बादी 

जैन-ज़ी है अकलमंद, अच्छी है 
भौतिकी, रसायन ओलंपिआड जीती है 
फुटबॉल, शतरंज की बाजी जीती है 
क्रिकेट में डंका बजता है 
स्वर्ण पदक कितने लाती है 
यह नयी उमर की नयी फसल है 
जोश है पूरा और उमंग है 
कर्मठ हैं और लगन है 
नहीं सड़क पर ये आये थे 

ध्यान से देखो और समझ लो 
सड़कों पर जो भी आये थे 
गुंडे मवाली थे, चोर उचक्के थे 
अपने आकाओं के कहने से 
जैन-ज़ी की बदनामी करने को 
सींग काटा बछड़ों में शामिल 
वो भेष बदल कर आये थे 
उन सब को पहचानो 
अपराधी हैं, पथ भ्रष्ट हैं 
छुपते फिरते, भड़काते हैं 
गलत राह पर उकसाते हैं
उनको पकड़ो और सजा दो 

जैन-ज़ी भी सब देख रही है 
सब के सब होशियार बहुत हैं 
कौन कहाँ कितने पानी में  
जान रहे हैं, समझ रहे हैं 
देश हमारा प्रगति शील है 
आशा और उमंगें लेकर 
नयी दिशा में दौड़ रहा है
कितने ही देशों की आँखों में 
रोड़ा बन कर खटक रहा है

जैन-ज़ी सब कुछ देख रही है 
बच्चा उनको नहीं समझना 
उनको पूरी समझ है सब की 
किस दुश्मन की आँखों में हम 
कितना ज्यादा खटक रहे हैं  
जान रही है, समझ रही है 
भटक नहीं जाना है हमको 
जान रही है, समझ रही है 

जैन-ज़ी भी तो देख रही है 
जान रही है, समझ रही है 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

आजादी, आजादी - मुझे चाहिये आजादी

जंतर – मंतर पर देखा होगा तुमने 
लोगों को चिल्लाते – आजादी, आजादी 
हमें चाहिये आजादी - आजादी, आजादी 
चीखा चिल्लाया था सबने - आजादी, आजादी 

अश्लील हरकतें रोज करीं थीं 
गालियां भी सब को देते थे 
- मोटी-मोटी, भद्दी-भद्दी  

गाली में नहीं रहा था कोई पीछे 
थे लड़का-लड़की एक समान 
बड़-चड़ देते थे, गंदी से गंदी 
शर्म हया कुछ बची नहीं थी 

एक सांस में सब को देते थे 
जो कहा पुलिस से उन सब ने 
वैसा ही सेना को भी बोला था 

मोदी जी को भी बोला था 
उसी भाषा में बोला था 
वैसी ही शैली में बोला था 
बिल्कुल वैसे ही बोला था 
जैसे सब को बोला था 

तिल-चट्टे कहते थे – 
लोकतंत्र अब नहीं बचा है ? 
संविधान अब ध्वस्त हुआ है ? 
मनमानी करते थे, दिखलाते थे 
नियम कानून नहीं बचा है कोई 
बस अब भीड़-तंत्र ही यहाँ चलेगा 

तिल-चट्टे सच कहते थे? 
वो सब जो चाहेंगे वो बोलेंगे 
जैसे चाहेंगे, जब चाहेंगे 
बस बोलेंगे मन में आये जो भी 
नाचेंगे गायेंगे, शोर मचाएंगे 

भारी सभा में हम सब 
भीष्म, द्रोण बन मौन रहेंगे? 
वो दुर्योधन बन जांघ पीट कर 
नाचेंगे गायेंगे, शोर मचाएंगे 
लज्जित हम सब को कर जाएंगे? 

जब-जब उनको देखा रहा था 
बार-बार मैं सोच रहा था 
कुछ हक मेरा भी तो होगा ? 
क्या नहीं मिलेगी मुझको आजादी? 

गुंडे मवालियों की हरकत से आजादी 
अभद्र, अश्लील इशारों से आजादी 
गंदी बोली, गंदी शैली से आजादी 
चोर-उचक्कों से आजादी 
तिल-चट्टों से आजादी 

मैं भी जंतर – मंतर जाऊँगा 
जोर शोर चिल्लाऊँगा - आजादी, आजादी 
मुझे चाहिये आजादी, आजादी, आजादी 

हम सब को जगाना होगा 
संविधान पर चलना होगा 
सब को दंडित करना होगा 
सबक सिखाना होगा सब को 
नहीं कोई फिर ऐसे कर पाए 
सब को यह बतलाना होगा 

आजादी, आजादी, मुझे चाहिये आजादी  
गुंडे मवालियों से आजादी 
गंदी भाषा- शैली से आजादी 
चोर-उचक्कों से आजादी 
तिल-चट्टों से आजादी 
आजादी, आजादी 
मुझे चाहिये आजादी

रविवार, 11 मई 2025

अवसर हाथ से जाने न देंगे

यह युद्ध नहीं चाहा हमने
यह युद्ध नहीं मांगा हमने

दुर्बुद्धी खड़ा है यहाँ सामने
सब अस्त्र-शस्त्र सामान लिए
जल थल नभ कब्जे में चाहे
और पैर तले हमको चाहे है

यह चाह रहा है क्या-क्या कुछ ?
 - धर्म त्याग दें हम सब अपना
   आधीन इसी के हम हो जायें
   मार काट फिर कर दें सबकी
   जो भी इसकी राह में आए
   हा-हाकार मचे धरा पर
   रावण राज्य बसे धरा पर

सात शताब्दी बाद का अवसर
हाथ से इसको जाने मत देना
पृथ्वीराज को याद करो
सात बार गौरी को पकड़ा
नाक धरा पर रगड़ी उसकी
पर अभय दान भी दे डाला
फिर एक बार वो जीत गया
मारा काटा उसने सबको
तहस-नहस सब कर डाला
नयी प्रथा की नीव धरी
सदियों जिसने राज किया

हार नहीं मानी पर हमने
और धर्म नहीं त्यागा हमने
सदियों हमने युद्ध किया
वीर प्रताप से डटे रहे
वीर शिवा सा युद्ध किया

इसे हटाया अंग्रेजों ने
उन्होंने फिर राज किया
मारा काटा कितनों को
कितनों को फांसी दे डाली
निहत्थों पर गोली भी मारी
पूरी ही अति कर डाली
फिर मिल कर हमें काम किया
सैंतालीस में उनको भगा दिया

मिल जुल कर हम सब बैठ गए
संविधान दे डाला खुद को
उसको पढ़ कर हम चलते हैं
नहीं किसी से कुछ कहते हैं
हम सब इसकी रक्षा करते हैं
और आंच नहीं आने देते हैं

दुर्बुद्धी कहीं भी कुछ भी कर ले
हम आंच नहीं आने देंगे
हम प्रताप के वंशज हैं
वीर शिवा का खून खौलता
दौड़ रहा है हम सब में
धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र सजा है
हम यहीं रहेंगे, यहीं लड़ेंगे
अभिमन्यु व घटोत्कच्छ बन
वीरगति हम पा जायें, अन्यथा
अर्जुन बन दुष्टों का वद्ध करेंगे
और विजयश्री हम पा जायेंगे
रामराज्य को बसा धारा पर
हम सपना पूरा कर जायेंगे

सात शताब्दी बाद का ये अवसर
हाथ से इसको, हम जाने न देंगे
हाथ से इसको, हम जाने न देंगे

शनिवार, 29 मार्च 2025

एक नपुंसक, गीदड़ वंशज

वो देखो 
वो मरियल गीदड़ 
वहाँ सभा में बैठ गया है 
समझ सुरक्षित खुद को बिल्कुल 
अनाप-शनाप कुछ बोल गया है 
शूर प्रतापी नर व्याघ्र का 
नाम सभा में लेकर उन पर  
थोड़ी कीचड़ उछाल गया है

वो नपुंसक है 
वीरों को तो नहीं जानता 
वीर श्रेष्ठ को कैसे जानेगा 
वो नहीं जानता, नहीं जानता 
राणा कुंभा के पौत्र को ?
नहीं जानता बिल्कुल भी वो 
महाराणा प्रताप के दादा को?
नहीं जानता उनके भी वो 

अस्सी घाव लगे थे फिर भी 
घमासान जो लड़ता रहता 
आतताई को धूल चटाता 
नाक धरा पर घिसता उनकी 
सारे जग में नाम कमाता 
राणा सांगा कहलाता है  
ये नपुंसक, गीदड़ वंशज है 
कैसे जानेगा उनको ?

ये तो सोच रहा है 
पूर्ण सुरक्षित ये बैठा है 
धर्म ग्रंथ में नहीं लिखा है 
काटो उसको, जो बोले उल्टा 
फिर चिंता कैसी, डर काहे का 
जो मन आएगा, बोलेगा

ये नहीं जानता प्रथा हमारी 
हम चुप रहते हैं 
सौ तक गिनते, चुप रहते हैं 
फिर चक्र सुदर्शन चल जाता है 
शिशुपाल का वध होता है 

इस नपुंसक गीदड़ को समझा दो 
जो पाप किया इसने, समझा दो 
तुरंन्त क्षमा की भीख, ये मांगेगा  
नाक धरा पर भी रगड़ेगा  

सबको याद रहे हम चुप हैं 
बस सौ तक गिनते चुप हैं 
हम चुप हैं 

गुरुवार, 2 जनवरी 2025

सर्दी में सूरज

 सर्दी में सूरज


सर्दी का मौसम है आया

देखो मुश्किल कितनी लाया

घना कोहरा है सब ओर

घुस कर बैठ गया है चोर


चलो हम एक प्रश्न उठायें

सूरज को कटघरे में लायें

सूर्य देव अब हाजिर हों 

शपथ लेकर हमें बतायें


रोज़ सवेरे काम तुम्हारा 

नभ में चमको जगमग कर दो

नयी ऊर्जा सब में भर दो

ठंडी आई तुम कम दिखते हो

बोलो तुम क्या दिक़्क़त आई

क्या जाड़ा तुमको भी लगता है?


बोला सूरज —

सन-सन करती हवा है चलती

मैं भी जाड़े से मरता हूँ

चंदा को तो दिया है तुमने

मुझको भी तुम लाकर दे दो

छोटा-मोटा जैसा भी हो

मुझको एक छिंगोला दे दो 

ऊन का एक छिंगोला दे दो

मोटा एक छिंगोला दे दो

नया साल


तुम भी एक विचित्र जीव हो

पूछ रहे मुझसे तुम अब

नये साल में नया है क्या


समझ मुझे पर नहीं है आता

क्यों देख नहीं पाते हो तुम

नये साल में नया है क्या


नया साल है

नयी लहर है

नयी तरंगें

नयी उमंगें

नया तरीका 

नया रंग है

नया ढ़ंग है

नयी दिशा है

नयी सोच है

नया विचार है

नयी योजना

नयी सुबह है

नयी हवा है


लोग पुराने हो सकते हैं

पर सोच नयी है 

नया सवेरा


तुम भी अब करबट बदलो

आँखें खोलो चश्मा बदलो

देखो आया - नया साल है

नया साल है

नया साल है

नया साल-2025

 

मैं ख़ुश हूँ 

बहुत ख़ुश हूँ 

नया साल आया

आज मेरे घर

बहुत आराम से

ठीक तरह से

बहुत ख़ुशी से


कई दिन से चाह थी

राह देखी थी मैंने

नयी आशा है

नयी उमंग है

पूरा उत्साह है

नया साल है


कल क्या होगा?

वही जो आज है

आज से बेहतर होगा

आशा के अनुकूल

उम्मीद पर खरा

चाह के अनुसार

पूरा त्रप्त करता 


साल नया है 

बना रहेगा हमेशा

बीस पच्चीस का

नया जवान रहेगा

बीस-पच्चीस का

हमेशा बीस-पच्चीस


सोमवार, 30 दिसंबर 2024

फिर पूछ लिया तुमने क्या हो?

 फिर पूछ लिया तुमने 

क्या हो

तुम्हीं कहो -

कैसे कह पाऊँगा क्या हो


गर्म ख़ून सा जोश तुम्हारा

पर्वत पर बहती धारा सी

चंचलता की मूरत हो तुम

मंद पवन की शीतलता हो

बच्चों सी भोली हो तुम

गुलाब की कोमलता हो

बुद्धि गार्गी की है तुम में

कड़क चमकती बिजली हो

चपला भी तुमको ही कहते हैं

जीवन का मतलब हो तुम

आराधना और तपस्या की थी

उन सब का ही फल हो तुम

सब बीमारी की एक दवा हो

वो राम बाण भी तुम ही हो 


और बताओ क्या-क्या कह दूं 

चमक आंख में तुमसे ही है 

हर पल आती मेरी साँसें हो तुम 

मेरे दिल की धड़कन हो तुम

जो कुछ भी है जग में मेरा

जगमग-जगमग तुमसे ही है


तुम्हीं बताओ क्या मैं बोलूँ

मुझको देखो ख़ुश हूँ कितना

जगमग-जगमग तुमसे ही हूँ 

जगमग-जगमग तुमसे ही हूँ 

ये कौन है?

मैं सोचता था -

ये कौन है?

क्या रिश्ता है?

कहाँ से है वो?

कब तक रहेगी 

मेरे मन पर छाई 

वो एक मालकिन 

पूरी तरह जकड़े

मुझे, मेरी सोच

मेरे विचार, मन पर

अधिपत्य जमाये


 न, न यह वो बात नहीं

आज है और कल नहीं

ये रिश्ता नहीं, संबंध है

सदियों से चला आ रहा

अनुपम अटूट संबंध


यह अलग नहीं है

मेरा ही स्वरूप है

मेरा ही बिम्ब है

मेरा सर्वांग है 

जन्मों से साथ है मेरे

रहेगी जन्मों तक

मेरे साथ, हरदम


ये दूर कब है

मेरी आस में हैं

मेरी साँस में है

और रहेगी हरदम

मेरी आस में 

मेरी साँस में 

रात कहा तुमने मुझसे

रात कहा तुमने मुझसे

  • तुम सो जाओ अब 

सपनों में खो जाओ अब


सोचा मेंने - 

क्या देखूँ सपना?


फिर सोचा अलग तरह से

सपना तो अपना होता है

चाहें जो वो देखे हम

मैं भी जो चाहूँ वो देखूँगा 


जानोगे तुम 

  - क्या स्वप्न गड़ा है मैंने


देखूँ तुमको उच्च शिखर पर

कीर्तिमान सब तोड़ो तुम

अपनी अभिलाषा पूरी कर लो 

आसमान में चढ़ जाओगे

पढ़-लिख कर पहचान बनाओ

जग में अपना नाम करो तुम

जगमग अपना नाम करोगे तुम 

झन्डा ऊँचा लहराओ 


मेरा सपना मेरा है

पर तुमको भी ये याद रहे

पूरी महनत और लगन से

तुम काम करो सारे अपने

सपना मेरा सच करना है

यह भार तुम्हारे कन्धे पर है

अब मैं सोता हूँ तुम जागो

सपना तुमको सच करना है


याद रहे तुमको हरदम

सपना तुमको सच करना है

सपना तुमको सच करना है