शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

कठपुतली का नंगा नाच


तुमने भी तो देखा होगा
जंतर – मंतर पर जमा हुए थे 
कितने सारे तिल चट्टे थे 
नंग धड़ंग वो नाच रहे थे 
जब चाहा जिसको नोच रहे थे 
धर्म, सभ्यता, संस्कार?
वो यह सब तो भूले बैठे थे 
बस मांग रहे थे आजादी 

सम्पूर्ण विश्व में पर जाकर देखो 
नहीं मिलेगा तुमको 
दूजा कोई देश जगत में 
जिसमें खुल कर गाली दो 
खुले मंच से भरी सभा में गाली दो
जब जी चाहे जिसको गाली दो
ऐसी वैसी जैसी चाहो गाली दो

सीएम, पीम को गाली दो
सेना के वीर जवानों को गाली दो
लोक तंत्र को खुलकर गाली दो
लाल किले पर चढ़ जाओ 
सड़कों पर आओ शोर मचाओ 
नंगा नाचो गाओ और नहाओ 
फिर जोर जोर से चिल्लाओ 
- आजादी, हमें चाहिए आजादी 

इससे ज्यादा कहाँ मिलेगी आजादी 
और बचा है करने को अब क्या ?
दिल में इच्छा क्या है करने की ?
लूटमार, आगजनी और खून करोगे?

तुम सब जिसको मांग रहे हो 
बतलाओ कैसी होगी वो आजादी
इससे ज्यादा खुल कर और कहाँ पर 
क्या-क्या, कैसे करने की सोच रहे हो?
तुम कैसी आजादी मांग रहे हो? 
बतलाओ तुम क्या मांग रहे हो?

समझ गया, मैं समझ गया
सोच तुम्हारी समझ गया
देख लिया है मैंने अब तो 
सीमा पार तुम्हारे आकाओं को 
नाच रहे हो तुम सब कठपुतली हो 
नहीं पता क्या तुमको कैसे हैं वो?
उन्हें चाहिए बर्बादी, केवल बर्बादी

तुम नाच रहे उनकी उंगली पर 
वो पैसा देते हैं, तुम्हें नचाते हैं 
सपनों की दुनिया में तुम्हें घुमाते 
धर्म, संस्कार, सभ्यता तुम भूल गए 
निकाल पड़े और यहाँ मचाते बर्बादी?

क्या चाल है उनकी, सब समझ गए हैं 
अब हम नहीं मचाने देंगे तुमको 
यहाँ किसी तरह की कोई भी बर्बादी 

तुम बिस्तर बांधो घर को निकलो 
चाल तुम्हारी सफल न होगी 
अब नहीं मचेगी बर्बादी 
यहाँ नहीं मचेगी बर्बादी 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

जैन-ज़ी सब-कुछ देख रही है

तुमने भी तो देखा होगा 
जंतर – मंतर पर जमा हुए थे 
कितने सारे तिल चट्टे थे 
नंग धड़ंग वो नाच रहे थे 
जब चाहा जिसको नोच रहे थे 
धर्म, सभ्यता, संस्कार?
वो यह सब तो भूले बैठे थे 
बस मांग रहे थे आजादी 

सम्पूर्ण विश्व में पर जाकर देखो 
नहीं मिलेगा तुमको 
दूजा कोई देश जगत में 
जिसमें खुल कर गाली दो 
खुले मंच से भरी सभा में गाली दो
जब जी चाहे जिसको गाली दो
ऐसी वैसी जैसी चाहो गाली दो

सीएम, पीम को गाली दो
सेना के वीर जवानों को गाली दो
लोक तंत्र को खुलकर गाली दो
लाल किले पर चढ़ जाओ 
सड़कों पर आओ शोर मचाओ 
नंगा नाचो गाओ और नहाओ 
फिर जोर जोर से चिल्लाओ 
- आजादी, हमें चाहिए आजादी 

इससे ज्यादा कहाँ मिलेगी आजादी 
और बचा है करने को अब क्या ?
दिल में इच्छा क्या है करने की ?
लूटमार, आगजनी और खून करोगे?

तुम सब जिसको मांग रहे हो 
बतलाओ कैसी होगी वो आजादी
इससे ज्यादा खुल कर और कहाँ पर 
क्या-क्या, कैसे करने की सोच रहे हो?
तुम कैसी आजादी मांग रहे हो? 
बतलाओ तुम क्या मांग रहे हो?

समझ गया, मैं समझ गया
सोच तुम्हारी समझ गया
देख लिया है मैंने अब तो 
सीमा पार तुम्हारे आकाओं को 
नाच रहे हो तुम सब कठपुतली हो 
नहीं पता क्या तुमको कैसे हैं वो?
उन्हें चाहिए बर्बादी, केवल बर्बादी

तुम नाच रहे उनकी उंगली पर 
वो पैसा देते हैं, तुम्हें नचाते हैं 
सपनों की दुनिया में तुम्हें घुमाते 
धर्म, संस्कार, सभ्यता तुम भूल गए 
निकाल पड़े और यहाँ मचाते बर्बादी?
नहीं-नहीं हम नहीं मचाने देंगे तुमको 
यहाँ किसी तरह की कोई भी बर्बादी 

जैन-ज़ी है अकलमंद, अच्छी है 
भौतिकी, रसायन ओलंपिआड जीती है 
फुटबॉल, शतरंज की बाजी जीती है 
क्रिकेट में डंका बजता है 
स्वर्ण पदक कितने लाती है 
यह नयी उमर की नयी फसल है 
जोश है पूरा और उमंग है 
कर्मठ हैं और लगन है 
नहीं सड़क पर ये आये थे 

ध्यान से देखो और समझ लो 
सड़कों पर जो भी आये थे 
गुंडे मवाली थे, चोर उचक्के थे 
अपने आकाओं के कहने से 
जैन-ज़ी की बदनामी करने को 
सींग काटा बछड़ों में शामिल 
वो भेष बदल कर आये थे 
उन सब को पहचानो 
अपराधी हैं, पथ भ्रष्ट हैं 
छुपते फिरते, भड़काते हैं 
गलत राह पर उकसाते हैं
उनको पकड़ो और सजा दो 

जैन-ज़ी भी सब देख रही है 
सब के सब होशियार बहुत हैं 
कौन कहाँ कितने पानी में  
जान रहे हैं, समझ रहे हैं 
देश हमारा प्रगति शील है 
आशा और उमंगें लेकर 
नयी दिशा में दौड़ रहा है
कितने ही देशों की आँखों में 
रोड़ा बन कर खटक रहा है

जैन-ज़ी सब कुछ देख रही है 
बच्चा उनको नहीं समझना 
उनको पूरी समझ है सब की 
किस दुश्मन की आँखों में हम 
कितना ज्यादा खटक रहे हैं  
जान रही है, समझ रही है 
भटक नहीं जाना है हमको 
जान रही है, समझ रही है 

जैन-ज़ी भी तो देख रही है 
जान रही है, समझ रही है 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

आजादी, आजादी - मुझे चाहिये आजादी

जंतर – मंतर पर देखा होगा तुमने 
लोगों को चिल्लाते – आजादी, आजादी 
हमें चाहिये आजादी - आजादी, आजादी 
चीखा चिल्लाया था सबने - आजादी, आजादी 

अश्लील हरकतें रोज करीं थीं 
गालियां भी सब को देते थे 
- मोटी-मोटी, भद्दी-भद्दी  

गाली में नहीं रहा था कोई पीछे 
थे लड़का-लड़की एक समान 
बड़-चड़ देते थे, गंदी से गंदी 
शर्म हया कुछ बची नहीं थी 

एक सांस में सब को देते थे 
जो कहा पुलिस से उन सब ने 
वैसा ही सेना को भी बोला था 

मोदी जी को भी बोला था 
उसी भाषा में बोला था 
वैसी ही शैली में बोला था 
बिल्कुल वैसे ही बोला था 
जैसे सब को बोला था 

तिल-चट्टे कहते थे – 
लोकतंत्र अब नहीं बचा है ? 
संविधान अब ध्वस्त हुआ है ? 
मनमानी करते थे, दिखलाते थे 
नियम कानून नहीं बचा है कोई 
बस अब भीड़-तंत्र ही यहाँ चलेगा 

तिल-चट्टे सच कहते थे? 
वो सब जो चाहेंगे वो बोलेंगे 
जैसे चाहेंगे, जब चाहेंगे 
बस बोलेंगे मन में आये जो भी 
नाचेंगे गायेंगे, शोर मचाएंगे 

भारी सभा में हम सब 
भीष्म, द्रोण बन मौन रहेंगे? 
वो दुर्योधन बन जांघ पीट कर 
नाचेंगे गायेंगे, शोर मचाएंगे 
लज्जित हम सब को कर जाएंगे? 

जब-जब उनको देखा रहा था 
बार-बार मैं सोच रहा था 
कुछ हक मेरा भी तो होगा ? 
क्या नहीं मिलेगी मुझको आजादी? 

गुंडे मवालियों की हरकत से आजादी 
अभद्र, अश्लील इशारों से आजादी 
गंदी बोली, गंदी शैली से आजादी 
चोर-उचक्कों से आजादी 
तिल-चट्टों से आजादी 

मैं भी जंतर – मंतर जाऊँगा 
जोर शोर चिल्लाऊँगा - आजादी, आजादी 
मुझे चाहिये आजादी, आजादी, आजादी 

हम सब को जगाना होगा 
संविधान पर चलना होगा 
सब को दंडित करना होगा 
सबक सिखाना होगा सब को 
नहीं कोई फिर ऐसे कर पाए 
सब को यह बतलाना होगा 

आजादी, आजादी, मुझे चाहिये आजादी  
गुंडे मवालियों से आजादी 
गंदी भाषा- शैली से आजादी 
चोर-उचक्कों से आजादी 
तिल-चट्टों से आजादी 
आजादी, आजादी 
मुझे चाहिये आजादी