शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

चुप रहो, खुश रहो

पकड़ते क्यों हो उसे बार-बार
हाथ से फिसल जाता है
हर बार छूट जाता है
निकल जाते है पहुंच से दूर

छोड़ दो, उसको जाने दो
जिस राह जाये, जहां जाये
जाये, न जाये, वापस आये
जो करे उसकी मर्ज़ी
परेशान न हो, फिक्र न करो

उसका अपना वजूद है
अपनी चाह है, मन है
जीने की तमन्ना हैं
उड़ने का ढंग है
अपने उसूल हैं, सिद्धान्त हैं
खुद से जी लेगा
मन की कर लेगा
फिर अगर फुर्सत मिली,
शायद तुम्हारी सुन लेगा

तब तक धैर्य धरो
भगवान पर भरोसा रखो
समझ से काम लो
चुप रहो, खुश रहो
चैन से जियो,
आराम से रहो

मेरे बच्चे

तुम्हारा जन्म याद है मुझे
बड़ी धूम से मिठाई बाँटी थी मैंने
बचपन से देखा है तुम्हें
देखते ही देखते तुम बड़े हो गए
तुम्हारे अंदर का वह बालक
बड़ा आदमी बन गया
पर न जाने कहाँ खो गया

जब भी तुम कहते हो
कोई बात कड़वी झुँझला कर
सुन लेता हूँ चुप रहता हूँ
जब तुम करते हो कुछ
अभद्र, असहनीय व्यवहार
सह लेता हूँ चुप रहता हूँ
मैं तुमसे प्यार करता हूँ

भगवान से प्रार्थना करता हूँ
मैं तुमसे हार जाऊँ
तुम्हारे बच्चे मेरे बच्चों से अच्छे हों
तुम्हें ये दिन न देखने पड़ें
मैं तुम्हें बचपन से जानता हूँ
तुम सह नहीं पाओगे
ग़म से मर जाओगे
इसलिए मैं चाहता हूँ
मैं तुमसे हार जाऊँ
मेरे बच्चे ! मैं तुमसे हार जाऊँ।

मंगलवार, 27 जून 2017

आंग्ल देश की भाषा

मैं सोचता था-
आंग्ल भाषा बोली जाती है
दुनिया भर में
हर कोने में।

इसका प्रेमी तुमको दुनिया में
सभी जगह मिल जायेगा
इसको जानोगे तब ही कुछ पाओगे।

नहीं पता था मुझको लेकिन
आंग्ल देश के पश्चिम में
वेल्स नाम का प्रान्त है कोई
वहाँ पर इसको
नहीं जानता हर कोई
नहीं प्रेम है सबको इससे
नहीं बोलता हर कोई।

मैं अज्ञानी था
नहीं पता था मुझको बिलकुल
चिराग तले पर अन्धकार इतना होगा
जिसे नहीं जानता हर कोई
नहीं पता है सबको इसका
नहीं जानता हर कोई ।

दिये का धर्म

एक दिया
टिमटिमाता जल रहा था
घनी अंधेरी रात में
दूर कहीं वीराने में
किसी पेड़ के नीचे.

अँधेरे ने उससे कहा
-नाहक खून जलाते हो अपना
कौन है यहां जो तुम्हें देखे
तुम्हारी मदद ले, रास्ता ढूंडे.
पतंगों को जलाते हो
बस व्यर्थ जलते हो.
हवा का एक झोंका ही काफी है
किसी छंड़ भी मिटा देगा तुम्हें.
क्या मिलेगा तुम्हें?
वीराने में एक अंजान मौत!
न देखा किसी ने, न सुना.
तुम्हारे नसीब में नहीं
किसी आँख का कोई आँसू
बस है एक लावारिस मौत.
नाहक जलते हो तुम.

मेरी मानो
-तेल-बाती बचाओ
अपनी आँखें मूंद लो
चुप लगा कर सो जाओ.
आज बचोगे तो कल काम आओगे.

दिया बोला –
किस भ्रम में हो तुम?
सच क्यों नहीं कहते हो?
तुम मुझ से डरते हो !
कहीं पत्तियाँ, सूखी लकड़ियाँ आग न पकड़ लें
दावानल तुम्हारा अस्तित्व न मिटा दे.
तुम नहीं चाहते मैं अपना काम करूँ
बिना डरे, बिना भेद-भाव, निष्पक्ष.
दूर तक लोगों को रास्ता दिखाऊं
उन्हें तुम्हारे चुंगल से बचाऊं.

अरे अधर्मी – निर्लज्ज!
माना मैं अकेला तेरे लिये काफी नहीं
तुझे पूरी तरह हटा न पाऊंगा
पर तुझ पर चोट भरपूर करूंगा.
जब तक तेल-बाती है,
जरा भी जान है
अपना धर्म निभाऊंगा
- तुझ से लड़ूंगा.
तेरी बपौती न चलने दूंगा
तुझे चैन से नहीं रहने दूंगा
तुझ से जीत न पाऊंगा तो क्या
चोट तो पूरी करूंगा.
तेरा नुकसान बहुत करूंगा.

जब तक तेल-बाती है,
ज़रा भी जान बाकी है
मैं जलता रहूंगा.
तुझ से लड़ता रहूंगा

चाइल्ड लेबर

एकाग्र चित्त,
ध्यान मग्न
अपने काम में लीन है
हर रोज़ व्यस्त रहती है
सुबह से शाम तक
झाड़ू, पोछा, बर्तन
बच्चों की देखभाल
सब पूरे ध्यान से।

क्या करे?
परिस्थितियाँ विषम हैं
जिम्मेदारी अधिक है
अनुभव सात साल का है
उम्र बारह साल की है।

बालिका बचाओ, बालिका पढ़ओ

देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी ।
प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।

मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।
नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी।

सीख उन्हें ये देगी, ध्यान रखेगी, पालेगी-पोसेगी
तकलीफ अगर होगी, तो रात-रात जागेगी ।
इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।

पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं।
वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।

अगर यह नहीं होगी, तो कल भोर नहीं होगी
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।
हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे
विश्वास मुझे है कि तब वो भी नहीं होगा ।
जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।

जिसके दम से सब दम लेते हैं दुनिया में ।
तब वो भी नहीं होगा-तब वो भी नहीं होगा।

जीवन - मुट्ठी भर रेत

जीवन मुट्ठी भर रेत
डरता हूं फिसल न जाए
हाथ से निकल न जाए
जिंदगी की घडि़यां
ये सुंदर, मधुर, सुहाने क्षण।
कसकर पकड़ लेता हूं
मुट्ठी में जकड़ लेता हूं

यह फिसलने लगता है
पकड़ से निकलने लगता है।
तेजी से - और तेजी से।
डरता हूं कैसे रोकूं इसको
पकड़ ढीली होती है
यह नहीं फिसलता तेजी से
नहीं निकलता फुर्ती से
रहता है मेरे साथ ज्यादा देर
आनंदित करता है, सुख देता है।

मुझको विश्वास दिलाता है फिर से
जीवन है मुट्ठी भर रेत
बस मुट्ठी भर रेत