शनिवार, 7 दिसंबर 2024

तुम क्या हो

तुम पूछते हो मुझसे कि तुम क्या हो

मेरी उम्र भर की दुआओं का असर हो


वो ज़िन्दगी ही असल ज़िन्दगी होगी 

जो तेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में बसर हो


प्यार मुहब्बत हो, मिल-बांट कर रहें 

डूंड रहा हूँ मैं कोई ऐसा भी शहर हो


वक़्त कट जाये और पता भी न चले

हमसफ़र कोई ऐसा हो तो सफर हो


तुम तो कायनात का नायाब नगीना हो

अब तुम्हीं कहो कैसे मुझको सबर हो


उस ज़िन्दगी को ज़िन्दगी कैसे कहें

जो तेरी ज़ुल्फ़ की छाँव में न बसर हो

सोमवार, 16 सितंबर 2024

शोध प्रस्ताव

मुझसे कहते हो - लिख डालूँ
जो चाहूँ जैसे भी, लिख डालूँ
लिख डालूँ, जो करना चाहूँ मैं
जैसे भी, जब चाहूँ करना मैं
रुक कर, बार-बार मैं सोच रहा हूँ

-  क्या भायेगा तुमको भी
   जो मेरे मन में आएगा ?
   जो मैं करना चाहूँगा ?

अब मन पक्का कर लिखता हूँ
जो तुम कहते हो, पाठ पढ़ाते हो
कैसे कहते हो, कितना कहते हो
कब कहते हो मुझसे तुम वो
कहते हो कैसे, कैसे समझाते हो
नित दिन तोला करते हो मुझको
कहते भी हो, कैसे तोलोगे मुझको
परीक्षा ले जाँचोगे फिर सबको
बोलोगे सही रहा वो कितना
कितना फिर वो गलत हुआ


कितना अच्छा काम करो हो
माने है सब कोई जिसको
है विश्व पटल पर नाम तुम्हारा
आओ सोचें, इस पर शोध करें
शिक्षा गुणवत्ता की बात करें ?

देखें, समझें कैसे आती है वो
विश्वविद्यालय में कहने की बातों में
विद्या-अध्यन के कार्यकलापों में
लिखने-पाठ पढ़ाने और परीक्षा में
कैसे रहती है, आती है कैसे
कैसे उसका पाठ पढ़ाएं
कैसे बतलाएं औरों को
क्या करते है कैसे करते हैं
कैसे सीखें उनसे, क्या सीखें
क्या सिखाएं उनको, कैसे सिखलाएं
विश्व पटल पर तुमसे कितने हैं?
कहां पहुंचना चाहो हो तुम
कहां पहुँच पहचान बनाओ तुम
इन सब बातों की बात करें ?
शिक्षा गुणवत्ता की बात करें?

बरसों की इच्छा है, सोचूँ इस पर
सोचूँ , कागज सारे पढ़ डालूं
मिल कर बैठूँ साथ सभी के
विद्वानों से चर्चा कर लूँ
सोचूँ, फिर बार-बार मैं सोचूँ
सार निकल कर आए जो कुछ
जैसा निकले, वैसा लिख डालूँ
मानो यदि तुम बातें ये मेरी
मन चाहा काम मुझे मिल जाएगा
आशा है मुझको, पूरी आशा है
यह काम सभी के भी आएगा

करबद्ध प्रार्थना है यह तुमसे
शोध प्रस्ताव तुम मानो मेरा
काम मुझे यह करने दो तुम
नत मस्तक हो जीवन भर
मान तुम्हारा किया करूँगा
मान तुम्हारा किया करूँगा

शनिवार, 17 अगस्त 2024

शाश्वत

मैंने देखा था 

एक छोटा सा बच्चा

 इधर उधर भागता 

खेल कूद में मस्त 

न कोई फिक्र , न कोई चिंता 

स्कूल से घर फिर खेल

खाना खाया फिर सोया 

कल फिर स्कूल 

ये बिलकुल  चैन से था

ये बेफिक्र था, 

हम सबको चिन्ता थी


अब बदल गया है कितना 

स्कूल  पढ़ाई होमवर्क 

रिवीज़न टेस्ट परीक्षा 

फिर कल की तैयारी 

डॉक्टरी का सपना 

‘नीट‘ की परीक्षा 

गनतत्व पर ध्यान


समझ गया है

दायित्व है इसपर

अपने कल का

हमारे कल का

हमारे स्वास्थ्य का

हमारे कल के स्वास्थ्य का

अपने भविष्य के जीवन का

ध्यान है इसे हरदम


आयु में छोटा है अभी

पर बड़ा हो गया है

समझदार हो गया है

बहुत समझदार हो गया है

हाँ और लम्बा भी

पिता से दो इंच ऊपर


इसमें लगन है समझ है

कड़ी मेहनत का पक्का इरादा है

मुझे भरोसा है पक्का विश्वास है

ये जायेगा सबसे ऊपर

सफलता के शिखर पर

जो चाहेगा कर लेगा

जब चाहेगा कर लेगा


तुम चैन से रहो, परेशान मत रहो

इसको करने दो, जो चाहे करने दो


याद रखना, ये शाश्वत सत्य है

    बालक जब चाहेगा 

    अपने मन में ठान लेगा  

    दिन- रात एक कर देगा 

    जो भी चाहेगा कर लेगा


तुम परेशान मत हो 

जो भी चाहेगा ये कर लेगा

तुम चैन से रहो, परेशान मत हो 

तुम चैन से रहो, परेशान मत हो

अनिक्षा

कौन है ये

नटखट, शरारती

भोली नादान

ख़ुशियाँ बिखेरती 

मेरे आँगन में घूमती


ये लेकर भागी वहाँ 

वो ले गयी वहाँ 

घर अस्त व्यस्त किया

सब उलट पलट किया

बटोरा दिया एक ओर


गोल सुन्दर चेहरा

बड़ी-बड़ी आँखें 

अपने दादा सी दिखती 

दादागिरी करती सब ओर


अनिच्छा से नहीं आई

हमारी प्रार्थना का फल है


नाम क्या है इसका?


अनिक्षा नाम है इसका

घर ख़ुशियों से भरा है इसने

यह अनिक्षा है

क्यों मौन हो तुम ?

आज तुम मौन हो ?

तुम्हारी चुप्पी का शोर 

कान के पर्दे फाड़ रहा है 

बहुत परेशान कर रहा है 

सभी सोच रहे हैं 

क्या हो गया तुम्हें ?

कहाँ छुपे हो तुम ?

आज क्यों मौन हो तुम ?


घटना तो बहुत दूर की बात है 

ज़रा अंदेशा हो, शुरु होते थे 

ज़ोर से चीखते चिल्लाते थे 

आसमान सिर कर देते थे 

और आज चुप हो तुम?


कुरु सभा की सीमा से परे 

इतने घृणित कृत्य पर 

इतने निन्दनीय कृत्य पर

इस भयंकर काण्ड पर

तुम चुप हो !?

आख़िर क्यों चुप हो?


हाँ, समझा

काण्ड तुम्हारे अपनों का है

तुम्हें डर है - फाँसी होगी?

जनता नौंच कर खा जायेगी

नाश हो जायेगा उनका


हाँ नाश तो होगा उनका

अवश्य ही नाश होगा उनका

साथ ही नाश होगा 

हर चुप रहने वाले का

और होना भी चाहिये

कुरु सभा की तरह

गुरु, पितामह, भई सबका


यहाँ मोमबत्ती नहीं जलाते

पूरी लंका ही फूंक देते हैं 

आततायी का वध होता है

अर्जुन संहार कर देता सबका

स्वयं राम कर देते है 

समूल समस्या समाधान


तुम मौन न रहो

छुपो मत, बाहर आओ

चुप्पी तोड़ो ज़ोर से चीखो

डाक्टर की आत्मा पुकारती है

धिक्कारती है तुम्हें 

बाहर निकलो चुप्पी तोड़ो

न्याय दिलाओ, न्याय दिलाओ

ज़ोर से चीखो और चिल्लाओ

न्याय दिलाओ, न्याय दिलाओ

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

अब जो होगा अच्छा होगा

टूटी सड़क
बिना बिजली का खम्बा
गन्दा पानी भरा गड्रडा
बदबूदार दूषित हवा
दूर तक अन्धकार
घोर अन्धकार
ऊपर से घना कोहरा।

हाथ को हाथ नहीं सूझता
हाथ को हाथ नहीं सुहाता
झपट कर छीन लेता है
कूड़ा-कचरा जो कुछ हो।

आदमी दुशमन है आदमी का
चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या
सब होता है यहाँ
व्यापार की तरह।
बस व्यापार नहीं होता
ठप हो गया है।

स्कूल कालेज शान खो चुके हैं
बाकी सब मान खो चुके हैं।

मैं हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ।
खुश हूँ।
हर बुरी बात पर खुश हूँ
सोचता हूँ - इससे बुरा क्या होगा
अब जो होगा अच्छा होगा।

**यह कविता उन शहरों की दुर्दशा पर है जो कभी बहुत सम्पन्न होते थे।

रविवार, 30 जुलाई 2023

साथ की बात न पूछो

जब साथ होता है कोई 
हाथों में हाथ लिये कोई
समय थम जाता है 
स्वप्न सा चलता है 
कल का पता होता है 
परसों पर विश्वास होता है 
सब कुछ ठीक होता है
न परेशानी न चिंता 
उसका साथ होता है बस 
हाथों में हाथ होता है बस 

उसको साथ लिए 
बैठे रहते हैं 
हाथों में हाथ लिए 
घण्टों तक चुप चाप 
हजारों बातें करते 
मैंने सुन लिया वो सब 
जो उसने कहा भी नहीं 
उसने समझ लिया वो सब 
जो मैं कहा न पाया कभी
बस हाथों में हाथ लिए 

हाथों में हाथ लिए 
चलते हैं बरसौं साथ 
सम्हालते एक दूसरे को 
आगे धकेलते बढ़ जाते हैं 
कोई मुश्किल रुकावट 
कहाँ टिकती है कभी 
बस रास्ता बनता है 
सफलता की सीढ़ी चढते 
हाथों में हाथ लिए चलते 

साथ का अपना नशा है 
अपना रंग ढंग है 
सबसे न्यारा है, 
सबसे प्यारा है 
सबसे अलग है 
सबसे गाढ़ा है 
सबसे ज्यादा है
चढ़े तो उतरता नहीं 
बस साथ में रहता है 
हाथों में हाथ लिए 

बरसों-बरसों तक 
यूं ही बना रहता  है 
हाथों में हाथ लिए 
उसको साथ लिए 
हाथों में हाथ लिए 

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

मैं चली जाऊँगी?

मैं चली जाऊँगी
कह अलविदा सबको
फिर आऊँगी नहीं?
किसने कहा?

मैं जाऊँगी नहीं
रहूँगी यहीं सबके बीच
छा गयी हूँ मैं
दिल, दिमाग़ में मन में
विचार में, जीवन मूल्यों में

समा गयी हूँ सबमें
बच्चों में पाओगे मुझे
नाक कान आँखों में
स्वभाव में आदत में

जैसे तुम सब मुझमें हो
मैं तुम सब में हूँ
रहूँगी यहीं
तुम सब के बीच

मैं जाऊँगी नहीं
रहूँगी यहीं
तुम सब के बीच

रविवार, 18 दिसंबर 2022

भगवान का साथ


आज अचानक
मोहित के मुँह से निकल गया
    - वो भगवान को पहचानता है
    उनसे मिला है, बात की है।
 
मैं हैरान था।
पूछा - कहाँ देखा?
कैसे मिले? कैसे पहचाना?'
 
बोला - जब कभी घूमकर देखता हूँ
पाता हूँ अपने दो पदचिन्ह
साथ ही दो और पद चिन्ह।
वो भगवान के होते हैं
जो हमारे साथ चलता है।
 
एक बार बहुत परेशानियों में उलझा था
जब मुड़कर देखा
मेरे पीछे चार नहीं दो पदचिन्ह थे
 
मैं घबराया
सोचा भगवान ने साथ क्यों छोड़ा?
क्या भूल हुयी मुझसे?
मैंने ऐसा क्या किया
जो उन्हें ठीक नहीं लगा?
 
ध्यान कर याद किया भगवान को
उन्हें बुलाया और यही प्रश्न किया।
 
भगवन हँसकर बोले-
मैं दुनिया में तुझे लाया हूँ
तेरा साथ कैसे छोड़ूँगा
मैं हमेशा तेरे साथ चलता हूँ।
मैं कभी पीछे चलता हूँ
कहीं तुम लड़खड़ाओ तो सम्हालूँ
कभी आगे चलता हूँ रास्ता दिखाता।
क्या तुम नहीं देखते - चार पदचिन्ह'
 
मैने कहा - भगवन!
जब देखता हूँ चार चिन्ह
खुश होता हूँ तुम साथ हो
पर आज जब देखा बस दो चिन्ह
घबराया, सोचा तुम नाराज़ हो
मुझे मंझधार में छोड़ गये।
क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?'
 
भगवान बोले - 
आजकल तुम परेशानी में हो
संकट से घिरे हो,
तुम घबरा गये हो
इसलिये मैं अकेला चलता हूँ
तुम मेरी गोदी में रहते हो।
पदचिन्ह चार नहीं दो बनते हैं
तुम मेरी गोदी में रहते हो।

दिल्ली – तब और अब

दिल्ली सुन्दर थी
कितनी मनमोहक थी
सब का दिल हर लेती थी
दिल-ली, दिल्ली कहलाती थी


सुन्दर घना जंगल होता था
वन्य जन्तुओं से भरा होता था
हवा साफ सुन्दर होती थी
निर्मल जल की धारा बहती थी
जमी नहीं रहती थी
जम-ना, यमुना कहलाती थी
इन्द्रलोक के टक्कर की थी
इन्द्रप्रस्थ कहलाती थी
धरती पर कोई स्वर्ग बना था
यहीं यहीं यहीं बना था।


न बचा कोई कट गये जंगल सभी
फिर जीव-जन्तुओं की बारी आयी
वो भी अब तो नहीं रहे
दूषित हवा हुई है कितनी
गन्दी कितनी सड़कें रहतीं
नाली में अटकी कीचड़ रहती

धुँआ गन्दगी फैली रहती
सड़कों पर गाड़ी अटकी रहती
जल स्तर नीचे खिसकता रहता
यमुना का पानी गन्दा अब रहता

यह यम की बहना है
पता सभी को इसका रहता
इन्द्र लोक अब नहीं यहाँ पर
कूड़ा-कचरा फैला है

अब देख इसे सब कहते है
क्यों धरती को हम मृ्त्युलोक कहते हैं।


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शाहजहां ने दीवाने खास में लिखवाया था
गर फिरदौस बर-रू-ए ज़मीं अस्तु ।
अमी अस्तु, अमी अस्तु, अमी अस्तु।।

बुधवार, 14 सितंबर 2022

कैनकिड्स के साथी

नित नये-नये ये काम करे
नित नये-नये ये रंग भरे
नाक पर ग़ुस्सा रहता है इसके
पर झटपट सब को शांत करे।

नेह लिए बोली में भरे
काम भी करती सभी खरे
सीधा-सादा नहीं समझना
ये नाक में सब के चने भरे।

शिवा ने दिया वर मोहे है
मैंने घर भी संभाल लिया है
पर काम नहीं छोड़ा है मैंने
सब को पल्लू में बाँध लिया है।

रूप रंग में न्यारी सबसे
रंग ढंग में प्यारी सबसे
दौड़ लगाती नीचे ऊपर
हंस कर झटपट काम करे।

मोह लिया है सबको इसने
काम भी सारा सीखा है इसने
इसको बच्चा नहीं समझना
लंबी दौड़ में जाना है इसने।

राम लला जी नाम है इनका
सबसे अलग ही काम है इनका
ये जल्दी-बाजी कभी न करते
पर काम टका टक रहता इनका।

संजय ने रास्ता दिखलाया
काम सभी यह छोड़कर आया
दीन दुनिया से नहीं कुछ लेना
जो बोला बस वो कर लाया।

कल्पना की कल्पना करो तुम
सुबह करो तुम, शाम करो तुम
उसकी दक्षता की कल्पना मगर
कभी भी कर नहीं पाओगे तुम

हरि ईश जहां पर रहता है
हर शीश वहाँ पर झुकता है
तुम इसको मानो, मत मानो
अनहोनी को होनी करता है

धनश्री, लक्ष्मी जी को कहते हैं
यह प्रधान सभी से, पहले आतीं हैं
भारत के कौने- कौने में जाती
यह कष्ट सभी के हर लेती हैं

सोने की मोनाल को ‘सोनल' कहते हैं
यहां वहाँ सब ओर जहां में चहके है
जहां कहीं भी, जब भी तुम जाओगे
अमिट छाप बस इसकी पाओगे

मुकुल सदा ही कूल रहे है
'मार' नहीं यह 'वाह' करे है
भीष्म सरीखा खड़ा अकेला
विपदायें यह दूर करे है

श्रीनाथ का द्वार खुला है
श्रद्धा से जब दस्तक दोगे
कष्ट तुम्हारे जो भी होंगे
दूर सभी वो झटपट होंगे

हंसता चेहरा शोक नहीं है
अनुभव का भंडार भरा है
जो वृक्ष फलों से लद जाता है
बस वो ही तो झुक पाता है!

व्यस्त काम में अपने हरदम
पर मीत सभी की बनी हुई है
अमित भंडार भरा महाजन
गिन्नीओं में सब को तोले है

ऋतु अच्छी है ठंड नहीं है
घिस कर चंदन रोज लगाओ
अंकित अपनी छाप करो तुम
दीपक को तुम रोज जलाओ

सुमित सरीखा मित्र सभी का
कपिल को कैसे भूल मैं पाता
अजय पुकारो तुम सब इसको
बिजय सदा ही है यह पाता

मीना जी हैं कभी न थकती
पढ़ा लिखा कर सबको रखतीं
निराश, हताश कोई न होए
हूँ माँ जी इसका ध्यान हैं करतीं

डरो नहीं तुम निर्भय रहना
कपीश नाम की माला जपना
अंश नहीं तुम पूरी करना
प्रकाश पुंज दिल में तुम रखना

विश्व जीत कर तुम आओगे
लोग प्रदान भी कलश करेंगे
तोड़ सितारा  घर लाओगे 
जग में अपना नाम करोगे

पप्पू जी की हंसी न करना
है पेट सभी का इनको भरना
आदित्य सरीखे चलते जाना
कर्तव्य मार्ग से कभी न हटाना

लो माना हमने भी, सच है
पूनम का चाँद बड़ा होता है
पर नित घटता है, बढ़ता है
वो सदा एक सा कब रहता है

- Friends! 
Here is a challenge. One who is first to recognize all the people correctly will get a signed copy of this poem. Best wishes.

रविवार, 9 जनवरी 2022

स्वप्न य साकार

वो हवा के झोंके सा आया
और बस छू कर चला गया
वो स्वप्न था? साकार था?
मैं तो सोचता ही रह गया।

रविवार, 26 सितंबर 2021

बेटी का दिन

आज का दिन ‘बेटी का दिन
जग में सब कहते हैं इसको
मुझको भी बोला जब सब ने
सोच में डूबा बैठा हूँ मैं
-    कौन दिवस बीता था ऐसे
जब याद न उसकी आयी मुझको

गोद में वो खेला करती है
किलकारी से भर देती है
जब भी हम घर पर आते हैं
हंसकर वो हम से मिलती है

ध्यान लगाकर वो पढ़ती है
अच्छे नंबर वो लाती है
नहीं असंभव कुछ भी उसको
सभी काम वो कर पाती है
डॉक्टर है वकील भी  है
अध्यापक है अफ़सर भी है
नभ में ऊपर वो उड़ती है
सेना मैं भी वो लड़ती है
कोई क्षेत्र बचा न उससे
बच्चों को वो ध्यान धरे है
बूढ़ों का भी मान  करे है

इन बातों को सोच समझ कर
मेरा मत कुछ अलग बना है
आज वो तुम सब से कहना है
एक दिवस की नहीं है बिटिया
वो सदा बसे है मन में मेरे
हर दिन उसके नाम लिखा है

रोज़ सुबह जब उठता हूँ
‘बेटी का दिन है’ - कहता हूँ
‘बेटी का दिन है’ - कहता हूँ

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

कितने निष्ठुर हो तुम

कितने निष्ठुर हो तुम 

किसी की सुनते नहीं हो 
किसी को देखते नहीं हो 
कोई कितना भी चीखे 
तुम्हें कोई चिंता नहीं, परवाह नहीं 

किसी की मृत्यु का समाचार 
तुम्हें कोई अंतर नहीं पड़ता 
वो मर गया – अपनी बला से 
उसको मार दिया – उनकी बला से 

तुम देखते तो होगे सब कुछ 
सुनते होगे जनता का शोर 
कैसे सह लेते हो सब 
फिर भी चुप रह जाते हो 

समझते हो सहनशील हो 
नहीं सहनशील नहीं हो 
बस संवेदनहीन हो तुम 
बहुत निष्ठुर हो 

तुम बड़े हो, 
दिल को बड़ा करो ! 
अपने आप से पूछो 
– क्यों हो तुम ? 
   इतने निष्ठुर क्यों हो तुम?

बिचारी मर गई

वो बच्ची मर गई
मर गयी य मार दी गई ?

मुझे नहीं पता

किसी की मृत्य का समाचार हो 
हत्या हो, बलात्कार हो, राहजनी हो 
तुम को अंतर नहीं पड़ता 
तुम सुन लेते हो, चुप रहते हो 

पता करते हो 
कहाँ हुआ किसने किया ? 
क्या दल था, क्या धर्म था ? 
जाति समीकरण क्या था ? 
किस जगह हुआ, किस प्रांत में हुआ ? 
तुम सरकार में हो य विपक्ष में ? 

सरकार में हो – चुप रहते हो 
विपक्ष में हो – डंडा डोली लेकर लग गए 
बाल की खाल निकालो 
खाल के बाल निकालो 
न मृत की अस्मिता की चिंता 
न परिवार की भावना का ध्यान 
गिद्ध हो नोच कर खाओ 

सभी समीकारण लगा लो 
अपना हानी-लाभ जोड़ लो 
सत्ता की लड़ाई है, करो 
सत्ता से लड़ाई है, करो 
सत्ता पक्ष में हो, रहो 
विपक्ष में हो, रहो 

अपनी सभ्यता न भूलो 
अपनी संस्कृति न भूलो 
बस सदैव ध्यान में रहे 
न्याय के पक्ष में रहो 
धर्म के पक्ष में रहो 
इनके विपक्ष में कभी न हो 

जो चली गई उसका ध्यान करो 
जब जीवित थी तुमने कुछ नहीं दिया 
जब तड़प कर मर गयी 
पार्थिव शरीर का मान नहीं किया 

मृत है अब – राम नाम सत्य है 
अब तो राख भी नहीं बची 
अब तो छोड़ दो उसको 
अब तो सम्मान दो उसको 
अब तो न्याय दो उसको 

महाभारत को मत भूलो 
धर्म के पक्ष में रहो 
न्याय के पक्ष में रहो 
न्याय दो उसको 
न्याय दो उसको

रविवार, 10 मई 2020

मेरे मित्र श्री मुकुल मरवाह से कुछ शेर और शायरी पर आदान प्रदान होता रहता है तो उस प्रवाह में कुछ शेर आ जाते हैं । अब यह तय किया है कि उन्हें यहाँ लिख दिया जाए। 

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ज़िन्दगी में जब तलक जिगर में दिल्लगी होगी 
ज़िन्दगी से ज़िन्दगी कभी भी कम नहीं होगी

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पाक सफ़ा हैं महफ़िल में वो जो शेर कहते हैं
गुनहगार बस हम ही हैं जो मुक़र्रर कहते हैं

शनिवार, 14 मार्च 2020

कोरोना किच्छू कोरेना


क्या लिखूं मैं सोच रहा हूं
लिख दूं क्या जो देख रहा हूं? 
नकाब पोश ये लोग यहां हैं
मुंह पर कपड़ा बंधा हुआ है
घबराहट चेहरे पर दिखती
हाथ हमेशा धोते रहते हैं

क्यों करते हैं ये सब ऐसा?

कोरोना का भूत है छाया
चीन से चल कर यहां है आया
तीन माह बस उमर है इसकी
दुनिया भर पर पकड़ है इसकी
इंग्लैंड, अमरीका, फ्रांस और रूस
इटली में सबको दिया है ठूंस

भारत में भी घुस आया है
पर समझ नहीं हमको आया है
क्या कर लेगा हम सब का ये?
सुनते हम सब बचपन से हैं
मां कहती थी, बापू कहता था
भाई बहन भी कहते रहेते थे
- ये करोना, वो करोना 
बड़ा हुआ फिर लगी नौकरी
सोचा इससे छुट जाऊंगा
आफिस पहुंचा बॉस ने बोला
- ये करोना, वो करोना 

फिर शादी की बारी आयी
राजा बन घोड़े पर बैठा
सोचा अब मन की कर लूंगा
सपना मेरा टूट गया फिर
जब पत्नी ने बोला मुझसे
- ये करोना, वो करोना 

इतना सब हम सुनते आये हैं
अभ्यस्त हुये हैं हम सब इसके
खाल हमारी हो गयी मोटी
जहां भी चाहे ये जायेगा
हमें नही कुछ कर पायेगा

विश्वास मुझे है ये पूरा
- कोरोना किच्छू कोरेना
कोरोना किच्छू कोरेना

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

हम देखेंगे

हम देखेंगे
हाँ हम देखेंगे
शाहीन बाग की नौटंकी
हम देखेंगे, जी हाँ हम देखेंगे

बहला फुसला कर लाये
कुछ भूले भटके आये
इन के पीछे छिपे हुए
सब देश द्रोहियों को
हम देखेंगे, जी हाँ हम देखेंगे

नये नहीं हैं ये सब
बस भेष बदलकर आते हैं
एवार्ड बापसी याद है तुमको
कुछ लोगों को डर लगता था
आज़ादी ली हाथों में अपने
फिर मार पीट की सड़कों पर
गाड़ी, दफ़्तर सब जला दिया
इन सबको हम देखेंगे
हाँ हम इन सबको देखेंगे

बच्चे, बूड़े, महिलाएँ हैं
सड़कों पर बैठे दुख पाते हैं
इनकी आड़ लिये बैठे हैं जो
बस ख़र्चा इनका देते हैं
वो छिप कर कब तक बैठेंगे
हम ड़ूंड निकालेंगे उनको
फिर हम देखेंगे,
जी हाँ उन सब को हम देखेंगे

देशद्रोही हैं, आतंकी हैं
स्लीपर सैल के कर्ता हैं
दुश्मन के टुकड़ों पर पलने वाले
टुकड़े करने की धमकी देते हैं
इन सब गद्दारों को हम देखेंगे, 

जी हाँ हम इन सब को देखेंगे

हम देखेंगे
जी हाँ हम देखेंगे

शनिवार, 17 अगस्त 2019

हाथ में जाओ तो जन्नत मिले
फिसल जाओ तो गमगीन हों हम
ये सारा जहां तो बस तुम्हीं से है 
फ़िज़ूल हैं बस कटपुतगी हैं हम।