गुरुवार, 1 जून 2017

कौन हो तुम?

कौन हो तुम
क्या संबन्ध है तुमसे?
किस जन्म का नाता है?
मैं नहीं जानता

बना रहता है चित्र तुम्हारा
मेरे दिल, दिमाग, मन पर
हर समय, हर पल

जब कुछ करता हूं
सोचता हूं –
तुम क्या सोचोगे?
क्या कहोगे?
क्या करोगे?
तुम खुश होगे या नाराज होगे?
बस यही सब सोचता हूं
जब भी कुछ करता हूं

तुम्हारा खयाल है
यही विचार हैं
कि रोक लेते हैं मुझे
गलत राह से बचाते हैं
सही राह पर चलाते हैं मुझे
कौन हो तुम?

कैसे बतलाऊं तुमको

कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं?
रहा साथ में इतने दिन से
नहीं पता तुमको फिर भी -
कैसा हूं मैं?
तुम्हीं कहो कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं?

तुमसे ही तो सीखा है मैंने -
सावन में झूले पर झूलो।
जाड़ों में भरी दोपहर
सूरज के आगे बैठो टांग पसारे।
बारिश में भीगो पानी में।
गर्मी में घूमो सुबह-शाम सागर तट पर।
बर्फ पड़े तो पर्वत पर जाओ
खेलो उसमें ढेले-ढेलों से।

तुमसे ही तो सीखा है -
डोलूं कैसे बगिया में
हाथों को हाथों में लेकर
झांकूं कैसे आंखों में आंखें डाले
देखूं कैसे उनमें तीनों लोकों को।

तुमसे ही तो सीखा है -
खेलूं कैसे बच्चों के संग
कैसे देखूं उनमें मूरत जगदम्बा की
कैसे रूप निहारूं उनमें भोले बाबा का।

तुमसे ही तो सीखा है मैंने -
मंदिर में जाओ शीश नवाओ
बस मंदिर में ही शीश नवाओ
बाकी सब के आगे झुकना मत
तनकर जीओ शीश उठाए।

तुमसे ही तो सीखा है इतना सब कुछ
क्या नहीं पता तुमको फिर भी
कैसा हूं मैं?
तम्हीं कहो - कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं।

उम्र का तक़ाज़ा

देखता हूं जब कभी मैं आइने में अक्स अपना।
दौड़ जाता है ज़हन में फिर मेरा गुज़रा ज़माना।।

बात ये उस वक्त की है जो यहां से गुजर गया।
मैं तो अब भी हूं वही बदल गया है पर ज़माना ।

शाम-रात, बारिश-पानी, जाड़ा-गर्मी कुछ भी नहीं थे।
था दौड़ता हर वक्त रहता, मैं गुनगुनाता नया तराना।

तब चाह थी दिल में लगी और जुनून तन में था जगा।
जोश था भरपूर मुझमें, हर रोज़ बनता था नया फसाना।।

जुनून अब भी है वही और चाह भी दिल में वही है।
जोश भी है दिल में मेरे, अक्सर गुनगुनाता हूँ तराना

पर अब हड्डियों में ज़ोर कम है पेशियों में दम नहीं है।
आईने में अक्स है और ज़हन में गुज़रा ज़माना।

अतीत, वर्तमान और भविष्य

समझ नहीं आता
किसे प्यार करूँ?

अपने अतीत को -
जो बीत गया
अब कभी वापस नहीं अयेगा?

अपने भविष्य को
जो आया ही नहीं
न मालूम कैसा होगा उसका स्वरूप?
फिर कैसे जानूं उसको?
कैसे ढालूँ कल्पना की परिधि में
कैसे ज्ञान करूँ, कैसे मान करूँ उसका?

इस त्रिकोण का तीसरा कोण है
अपना वर्तमान।
यह क्षणिक है , रुकता ही नहीं
बहता जाता है एक नदी की तरह।
यह तो अपने आप में एक पहेली है।

अतीत, भविष्य और वर्तमान
तीनों ही एक समस्या हैं
पर मेरी नहीं।
मेरी समस्या है -
इन तीनों में से एक को चुनना।

मैं वर्तमान को चुनता हूँ।
उसे प्यार करता हूँ
पाता हूँ अपने आप को
अतीत और भविष्य से मुक्त
न बीते हुए की खुशी , न शोक उसका
न आने वाले का डर।

मैं जीता हूँ - वर्तमान में
बस इस क्षण में।
प्यार करता हूँ इससे
जीता हूँ इस क्षण में।

बुधवार, 17 मई 2017

न कोई आशा, न प्रतीक्षा

समुद्र के बीच
खड़ा ढूँढता था
जल को, प्यासा
एकदम अकेला।

चकोर सी
व्यथा नहीं थी उसकी।
चकोर अच्छा है।
जिसे प्रतीक्षा है,
स्वाति नक्षत्र के जल की।
विश्वास है, भरोसा है,

एक दिन अवश्य आयेगी।
तृप्त कर उसे
प्यास बुझा देगी।
शक्ति, हिम्मत और सहारा देगी
पुनः अगले साल तक प्रतीक्षा की।

वह बेचारा
बस खड़ा था
समुद्र के बीच
प्यासा, एकदम अकेला
न किसी की प्रतीक्षा
न कोई आशा।

कलियुग की गान्धारी

कलियुग में 
गान्धारी को महाभारत का
आँखों देखा हाल
सुनाने का कार्य
संजय और उसके साथियों ने लिया।

परन्तु यह कार्य
उन्होंने सच्चाई और कुशलता से नहीं किया,
या फिर 
गॉन्धारी ने 
अपने आँखों की पट्टी से
अपने कानों को भी बन्द कर लिया था।

वह अपने पुत्र को,
लौह पुरुष बनाने के लिये
नग्न हो , अपने सम्मुख आने को न कह सकी।

वह मिट्टी का पुतला
बेचारा बाढ़ में  बह गया।

शनिवार, 13 मई 2017

लाल किला

लाल किला, लाल है क्यूँ
जानते हो तुम?

जब बना था
लाखों ने खून पसीना एक किया था
इसकी नींव को भरा था
बन गया यह
एक अजूबा अपनी तरह का
धरती पर स्वर्ग यही था

इसकी अपनी शान थी
बादशाहत की आन थी
आन पर मर मिटे कितने शहीद
लहू बहा कितनों का
कोई हिसाब नहीं

फिर लुट गयी आन
शान गुम हो गयी
नाहक गरीबों की जान गयी
नादिर ने मारा सभी को
जो मिला इसके सामने
जब तक कोई जिन्दा बचा।
फिर लाश को पीटा
अब्दाली ने कई बार लूटा
खून से रंग दिया पूरा।

फिर आये लाल मुँहे
अपनी करतूतों पर
शहजादों को मारा
प्यास नहीं बुझी
फिर खून की नदी बही।

फिर आज़ादी की लड़ाई
बन्दूक तोप तलवारों के खिलाफ
बिना बन्दूक तोप तलवारों की लड़ाई।
बहुत शर्मनाक हरकतें हुईं
पर निहत्थों के आगे एक न चली
सत्ता की कमर चरमराई और टूट गयी
देश आज़ाद हो गया।

फिर देखी इसने लड़ाई
सरहद पर हुई कई बार की लड़ाई
इसकी शान को आँच न आये
इसकी आन बनी रहे
यही सोचा होगा उन सभी ने
जो वीरगति के काम आये।

इसने देखा है सब
खून के हर कतरे का हिसाब रखा है
लोगों को याद रहे
सब कुछ याद रहे
कोई भूलने न पाये
इसलिये अपना रंग लाल रखा है।

यह नहीं होगी, तो कल भोर नहीं होगी


देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी ।
प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।

मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।
नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी।

सीख उन्हें ये देगी, ध्यान रखेगी, पालेगी-पोसेगी
तकलीफ अगर कुछ होगी, तो रात-रात जागेगी ।
इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।

पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं।
वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।

अगर यह नहीं होगी, तो कल भोर नहीं होगी
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।
हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे
विश्वास मुझे है तब वो भी नहीं होगा ।

जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।
जिसके दम से सब दम लेते हैं दुनिया में ।
तब वो भी नहीं होगा-तब वो भी नहीं होगा।