मंगलवार, 27 जून 2017

बच्चन जी की बात नहीं है बच्चों वाली

बच्चन जी की बात नहीं है बच्चों वाली
सर माथे पर अपने माना है उनको मैंने
कहा उन्होंने था, हम सबको बतलाया था -
"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती"

पर मैंने तो बचपन से देखा है, अब तक देखा है
खाली कोशिश ही करते रहने वालों की जीत नहीं होती
बस कोशिश ही करते रहने वालों की जीत नहीं होती

तुम बस कोशिश ही करते करते मत रह जाना
करना कोशिश हर बार मगर, रुक मत जाना
रस्ते में कांटे हों, पत्थर हों, तुम मत घबराना
नदियां हों, पर्वत हों या समुंदर तट का आ जाना
रोक न तुम को पाये बिजली, बारिष का आना

थक मत जाना, रुक मत जाना हार मान कर बैठ न जाना
यदि रास्ते में गिर जाओ कहीं तुम, मत घबराना
सम्हलना उठना, उठ कर फिर चल देना
मुश्किल हों कितनी भी, दूने उत्साह लगन से चलना
सम्हलना उठना, उठ कर फिर चल देना
ध्यान रहे, तुमको है मंज़िल पर ध्वज फहराना
गंतव्य ध्यान में रखना अपने, मत रुकना

याद रहे तुमको हर दम, तुम भूल न जाना 
"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती"
 
और दूसरी बात हमारी
ये भी अपने ध्यान में रखना 
मंज़िल पर हों गढ़ी हमेशा आंखें जिसकी
जीत हमेशा ही होती आयी है उसकी 

जीत हमेशा होगी उसकी
मंज़िल पर हों गढ़ी हमेशा आंखें जिसकी
मंज़िल पर हों गढ़ी हमेशा आंखें जिनकी

नदिया का पानी


कल-कल कल-कल
कल-कल कल-कल
बहता जाता पानी
नदिया का पानी
कल-कल कल-कल करता
बहता है पर्वत से
घाटी से बहता है
कल-कल कल-कल करता
अविरत बहता जाता है पानी

राह रोक कर खड़े हुये
पर्वत कितने ऊंच-ऊंचे
कहते हैं – हम हैं बलशाली
ऊंचे कितने, बरसों से प्रहरी हैं
रोक नहीं पाते वो उसको
वह जाता है रोज़ निरंतर
काट उन्हें, वो बहता जाता है
कहता जाता है
कल-कल कल-कल

पर्वत के पत्थर
आते हैं रस्ते में उसके
कहते हैं उसको
रुकजा हम हैं रस्ते में तेरे
राह रोक कर खड़े हुये 
तू थमजा, साथ हमारे रुकजा
पड़े वहीं रह जाते हैं पत्थर
कभी काटता वो उनको
कभी छांटता वो उनको
जाता है अपने रस्ते

ये इन्तजार में रहते उसके
सोचा करते -
वो कल रुक जायेगा
पर वह बहता जाता है
कहता जाता है
कल-कल कल-कल

तुम जब भी देखो
कोई रोड़ा, पत्थर कोई आये
राह तुम्हारी रोक खड़ा हो
बोले – रुक जाओ, थम जाओ
तुम जाना रस्ते पर अपने
हंस कर तुम उससे कहना
कल-कल कल-कल

गुरुवार, 1 जून 2017

क्यों सोचते हैं हम?

कल एक पुराने दोस्त से
मेरी मुलाकत हो गयी
मुझे देख चौंक उठे
बोले – कैसे हो?
तबीयत ठीक है?

मैंने कहा – हां ठीक है
मज़े में हूं बस सोच रहा था कि ...
उन्होंने मुझे बीच में टोक दिया
आगे बोलने से रोक दिया
कहा – क्यों सोचते हो?
आखिर क्या बात है ?
तुम सोचते क्यों हो?

तुमने देखा है किसी पंछी को
हवा से बातें करते झूमते
मस्ती में अपनी धुन में गाते
किसी तितली देखा है उड़ते
किसी भंवरे को मंडराते देखा है
कोयल की कूक सुनी है

कभी देखा है किसी कुत्ते को
गाड़ी के पीछे दौड़ते
बिल्ली को चूहे से खेलते
खरगोश को छलांग लगाते
हिरण को भागते देखा है
बैल को काम करते
रहट से पानी खींचते देखा है
शेर को शिकार करते
मछ्ली को तैरते देखा है
कभी देखा है तुमने
किसी बच्चे को मस्ती करते

ये सब सोचते नहीं हैं
ज़िन्दगी के मज़े लेते हैं
ज़िन्दगी मज़े से जीते है
तुम नाहक परेशान होते हो
व्यर्थ सोचते हो
जिन्दगी का ढंग बदल दो
जिन्दगी खुल कर जी लो
सोचना बंद कर दो

मझे समझ आया
दुनियां में कितने जीव हैं
खुल कर जीते हैं
सोचते नहीं हैं
ये भी कितना सीधा आदमी
कितना अच्छा आदमी
सोचता नहीं है
मज़े से जीता है!

मैं फिर सोच में पड़ गया
ये सब मजे से जीते हैं
हम बेकार ही सोचते हैं?
क्यों सोचते हैं हम?

क्यों पूछा तुमने मुझसे?

क्यों पूछा तुमने मुझसे –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?

उठते – बैठते छवि तुम्हारी
आँखों में रहती है मेरे
तुम मेरी सांसों में हो
मेरे प्राणों में बसती हो
नहीं पता क्या तुमको ?
कितना प्यार मुझे है तुमसे?

फिर मुझसे क्यों पूछा तुमने –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?

कौन हो तुम?

कौन हो तुम
क्या संबन्ध है तुमसे?
किस जन्म का नाता है?
मैं नहीं जानता

बना रहता है चित्र तुम्हारा
मेरे दिल, दिमाग, मन पर
हर समय, हर पल

जब कुछ करता हूं
सोचता हूं –
तुम क्या सोचोगे?
क्या कहोगे?
क्या करोगे?
तुम खुश होगे या नाराज होगे?
बस यही सब सोचता हूं
जब भी कुछ करता हूं

तुम्हारा खयाल है
यही विचार हैं
कि रोक लेते हैं मुझे
गलत राह से बचाते हैं
सही राह पर चलाते हैं मुझे
कौन हो तुम?

कैसे बतलाऊं तुमको

कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं?
रहा साथ में इतने दिन से
नहीं पता तुमको फिर भी -
कैसा हूं मैं?
तुम्हीं कहो कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं?

तुमसे ही तो सीखा है मैंने -
सावन में झूले पर झूलो।
जाड़ों में भरी दोपहर
सूरज के आगे बैठो टांग पसारे।
बारिश में भीगो पानी में।
गर्मी में घूमो सुबह-शाम सागर तट पर।
बर्फ पड़े तो पर्वत पर जाओ
खेलो उसमें ढेले-ढेलों से।

तुमसे ही तो सीखा है -
डोलूं कैसे बगिया में
हाथों को हाथों में लेकर
झांकूं कैसे आंखों में आंखें डाले
देखूं कैसे उनमें तीनों लोकों को।

तुमसे ही तो सीखा है -
खेलूं कैसे बच्चों के संग
कैसे देखूं उनमें मूरत जगदम्बा की
कैसे रूप निहारूं उनमें भोले बाबा का।

तुमसे ही तो सीखा है मैंने -
मंदिर में जाओ शीश नवाओ
बस मंदिर में ही शीश नवाओ
बाकी सब के आगे झुकना मत
तनकर जीओ शीश उठाए।

तुमसे ही तो सीखा है इतना सब कुछ
क्या नहीं पता तुमको फिर भी
कैसा हूं मैं?
तम्हीं कहो - कैसे बतलाऊं तुमको
कैसा हूं मैं।

उम्र का तक़ाज़ा

देखता हूं जब कभी मैं आइने में अक्स अपना।
दौड़ जाता है ज़हन में फिर मेरा गुज़रा ज़माना।।

बात ये उस वक्त की है जो यहां से गुजर गया।
मैं तो अब भी हूं वही बदल गया है पर ज़माना ।

शाम-रात, बारिश-पानी, जाड़ा-गर्मी कुछ भी नहीं थे।
था दौड़ता हर वक्त रहता, मैं गुनगुनाता नया तराना।

तब चाह थी दिल में लगी और जुनून तन में था जगा।
जोश था भरपूर मुझमें, हर रोज़ बनता था नया फसाना।।

जुनून अब भी है वही और चाह भी दिल में वही है।
जोश भी है दिल में मेरे, अक्सर गुनगुनाता हूँ तराना

पर अब हड्डियों में ज़ोर कम है पेशियों में दम नहीं है।
आईने में अक्स है और ज़हन में गुज़रा ज़माना।