गुरुवार, 1 जून 2017

अतीत, वर्तमान और भविष्य

समझ नहीं आता
किसे प्यार करूँ?

अपने अतीत को -
जो बीत गया
अब कभी वापस नहीं अयेगा?

अपने भविष्य को
जो आया ही नहीं
न मालूम कैसा होगा उसका स्वरूप?
फिर कैसे जानूं उसको?
कैसे ढालूँ कल्पना की परिधि में
कैसे ज्ञान करूँ, कैसे मान करूँ उसका?

इस त्रिकोण का तीसरा कोण है
अपना वर्तमान।
यह क्षणिक है , रुकता ही नहीं
बहता जाता है एक नदी की तरह।
यह तो अपने आप में एक पहेली है।

अतीत, भविष्य और वर्तमान
तीनों ही एक समस्या हैं
पर मेरी नहीं।
मेरी समस्या है -
इन तीनों में से एक को चुनना।

मैं वर्तमान को चुनता हूँ।
उसे प्यार करता हूँ
पाता हूँ अपने आप को
अतीत और भविष्य से मुक्त
न बीते हुए की खुशी , न शोक उसका
न आने वाले का डर।

मैं जीता हूँ - वर्तमान में
बस इस क्षण में।
प्यार करता हूँ इससे
जीता हूँ इस क्षण में।

बुधवार, 17 मई 2017

न कोई आशा, न प्रतीक्षा

समुद्र के बीच
खड़ा ढूँढता था
जल को, प्यासा
एकदम अकेला।

चकोर सी
व्यथा नहीं थी उसकी।
चकोर अच्छा है।
जिसे प्रतीक्षा है,
स्वाति नक्षत्र के जल की।
विश्वास है, भरोसा है,

एक दिन अवश्य आयेगी।
तृप्त कर उसे
प्यास बुझा देगी।
शक्ति, हिम्मत और सहारा देगी
पुनः अगले साल तक प्रतीक्षा की।

वह बेचारा
बस खड़ा था
समुद्र के बीच
प्यासा, एकदम अकेला
न किसी की प्रतीक्षा
न कोई आशा।

कलियुग की गान्धारी

कलियुग में 
गान्धारी को महाभारत का
आँखों देखा हाल
सुनाने का कार्य
संजय और उसके साथियों ने लिया।

परन्तु यह कार्य
उन्होंने सच्चाई और कुशलता से नहीं किया,
या फिर 
गॉन्धारी ने 
अपने आँखों की पट्टी से
अपने कानों को भी बन्द कर लिया था।

वह अपने पुत्र को,
लौह पुरुष बनाने के लिये
नग्न हो , अपने सम्मुख आने को न कह सकी।

वह मिट्टी का पुतला
बेचारा बाढ़ में  बह गया।

शनिवार, 13 मई 2017

लाल किला

लाल किला, लाल है क्यूँ
जानते हो तुम?

जब बना था
लाखों ने खून पसीना एक किया था
इसकी नींव को भरा था
बन गया यह
एक अजूबा अपनी तरह का
धरती पर स्वर्ग यही था

इसकी अपनी शान थी
बादशाहत की आन थी
आन पर मर मिटे कितने शहीद
लहू बहा कितनों का
कोई हिसाब नहीं

फिर लुट गयी आन
शान गुम हो गयी
नाहक गरीबों की जान गयी
नादिर ने मारा सभी को
जो मिला इसके सामने
जब तक कोई जिन्दा बचा।
फिर लाश को पीटा
अब्दाली ने कई बार लूटा
खून से रंग दिया पूरा।

फिर आये लाल मुँहे
अपनी करतूतों पर
शहजादों को मारा
प्यास नहीं बुझी
फिर खून की नदी बही।

फिर आज़ादी की लड़ाई
बन्दूक तोप तलवारों के खिलाफ
बिना बन्दूक तोप तलवारों की लड़ाई।
बहुत शर्मनाक हरकतें हुईं
पर निहत्थों के आगे एक न चली
सत्ता की कमर चरमराई और टूट गयी
देश आज़ाद हो गया।

फिर देखी इसने लड़ाई
सरहद पर हुई कई बार की लड़ाई
इसकी शान को आँच न आये
इसकी आन बनी रहे
यही सोचा होगा उन सभी ने
जो वीरगति के काम आये।

इसने देखा है सब
खून के हर कतरे का हिसाब रखा है
लोगों को याद रहे
सब कुछ याद रहे
कोई भूलने न पाये
इसलिये अपना रंग लाल रखा है।

यह नहीं होगी, तो कल भोर नहीं होगी


देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी ।
प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।

मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।
नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी।

सीख उन्हें ये देगी, ध्यान रखेगी, पालेगी-पोसेगी
तकलीफ अगर कुछ होगी, तो रात-रात जागेगी ।
इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।

पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं।
वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।

अगर यह नहीं होगी, तो कल भोर नहीं होगी
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।
हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे
विश्वास मुझे है तब वो भी नहीं होगा ।

जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।
जिसके दम से सब दम लेते हैं दुनिया में ।
तब वो भी नहीं होगा-तब वो भी नहीं होगा।

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

माँ, चली गयी आज



माँ, चली गयी आज
बीमार थी कई दिन से
अस्पताल में जी घबराता था उसका
मगर घर पर बहुत ख़ुश रहती थी

क्या करते इन्फैक्शन था बीमार थी
बिना अस्पताल राहत न मिलती
ले जाना पड़ा, भर्ती कराना पड़ा
कभी कमरे में होती कभी आईसीयू
बस इसमें सिमट कर रह गयी थी

फिर ऊब गया मन नाराज़ हो गयी
इलाज पूरा हुआ, अब ध्यान रखते हैं
सुबह शाम दवा से मेरा पेट भरते हैं

रूठ जाती, बिलकुल बच्चों सी रूठ जाती
दाँत भींच लेती थी पानी भी नहीं पीती
बहुत बहलाया, डाक्टर ने भी समझाया
कभी मानती, कभी ज़िद पर डटी रहती

दिमाग़ एकदम ठीक, सब पता था उसे
बस शरीर जबाब दे रहा था उसका
एक दिन डाक्टर को रोक लिया उसने
उसने पूछ, कि बेचारा बस चुप रह गया

-इन्फैक्शन तो ठीक हो गया है अब
रह गया है तो बस केवल एक बुढ़ापा
बेइलाज है, क्या इलाज है उसका?
यहाँ देखभाल है, घर पर भी हो जायेगी
बच्चों के साथ रहूँगी, दिल बहल जाएगा
जब बुलाओगे चैक-अप यहाँ कराऊंगी

छुट्टी दें, यहाँ नहीं रहना, घर जाना है मुझे
यहाँ से नहीं, घर से ही जाना है मुझे

फिर घर आयी और घर से चली गयी
जैसा वो चाहती थी, वैसे ही कर गयी

माँ बीमार थी कई दिन से
आज चली गयी
हमेशा-हमेशा के लिये चली गयी

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

चिड़िया को मत बन्द करो तुम

आओ बच्चों तम्हें सुनाऊँ।
एक कहानी बहुत पुरानी ।।
नन्ही सी एक चिड़िया रानी।
मेरे  घर  में  आती  थी ।।

कूक-कूक कर मुझे बुलाती।
किलकारी से घर भर जाती ।।
मीठे  सुर  में  गाना  गाती ।
हम सब का वो दिल बहलाती ।।

जब भी उसका मन करता था।
बहुत दूर वह उड़ जाती थी।।
भूख लगी तो घर को आती ।
वरना वो बाहर रह जाती ।।

एक दिवस को नटखट चुन्नू।
जाल बिछा कर बैठ गया।।
चिड़िया को उसने पकड़ लिया।
पिंजड़े में फिर जकड़ दिया।।

चिड़िया अब मुश्किल में थी।
चुन्नू  के  कब्जे  में  थी ।।
गाना उसने बन्द किया।
अनशन पानी ठान लिया ।।

चुन्नू ने उसको ललचाया।
लड्डू पेड़े  खाने को लाया ।।
चिड़िया बिलकुल बदल गयी थी ।
सूरत  उसकी  उतर  गयी  थी ।।

चिड़िया थी मन की रानी।
आँखों में था उसके पानी।।
मैंने फिर पिंजड़ा खोला।
चिड़िया को बाहर छोड़ा।।

फुर से चिड़िया निकल गयी।
दूर  डाल  पर  बैठ  गयी।।
पहले  उड़  ऊपर को  जाती।
फिर गोता मार नीचे को आती।।

मीठे सुर में गाना गाती।
मकारीना नाच दिखाती।।
कितनी खुश चिड़िया रहती।
जो मन  आया  वो  करती।।

एक बात  की  सीख करो तुम।
चिडि़या को मत बन्द करो तुम।।
जितनी  खुश  चिड़िया होगी।
उतने  खुश  तुम  भी  होगे।।

चिड़िया को मत बन्द करो तुम।
चिड़िया को मत बन्द करो तुम।