रविवार, 30 जुलाई 2023

साथ की बात न पूछो

जब साथ होता है कोई 
हाथों में हाथ लिये कोई
समय थम जाता है 
स्वप्न सा चलता है 
कल का पता होता है 
परसों पर विश्वास होता है 
सब कुछ ठीक होता है
न परेशानी न चिंता 
उसका साथ होता है बस 
हाथों में हाथ होता है बस 

उसको साथ लिए 
बैठे रहते हैं 
हाथों में हाथ लिए 
घण्टों तक चुप चाप 
हजारों बातें करते 
मैंने सुन लिया वो सब 
जो उसने कहा भी नहीं 
उसने समझ लिया वो सब 
जो मैं कहा न पाया कभी
बस हाथों में हाथ लिए 

हाथों में हाथ लिए 
चलते हैं बरसौं साथ 
सम्हालते एक दूसरे को 
आगे धकेलते बढ़ जाते हैं 
कोई मुश्किल रुकावट 
कहाँ टिकती है कभी 
बस रास्ता बनता है 
सफलता की सीढ़ी चढते 
हाथों में हाथ लिए चलते 

साथ का अपना नशा है 
अपना रंग ढंग है 
सबसे न्यारा है, 
सबसे प्यारा है 
सबसे अलग है 
सबसे गाढ़ा है 
सबसे ज्यादा है
चढ़े तो उतरता नहीं 
बस साथ में रहता है 
हाथों में हाथ लिए 

बरसों-बरसों तक 
यूं ही बना रहता  है 
हाथों में हाथ लिए 
उसको साथ लिए 
हाथों में हाथ लिए 

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

मैं चली जाऊँगी?

मैं चली जाऊँगी
कह अलविदा सबको
फिर आऊँगी नहीं?
किसने कहा?

मैं जाऊँगी नहीं
रहूँगी यहीं सबके बीच
छा गयी हूँ मैं
दिल, दिमाग़ में मन में
विचार में, जीवन मूल्यों में

समा गयी हूँ सबमें
बच्चों में पाओगे मुझे
नाक कान आँखों में
स्वभाव में आदत में

जैसे तुम सब मुझमें हो
मैं तुम सब में हूँ
रहूँगी यहीं
तुम सब के बीच

मैं जाऊँगी नहीं
रहूँगी यहीं
तुम सब के बीच

रविवार, 18 दिसंबर 2022

भगवान का साथ


आज अचानक
मोहित के मुँह से निकल गया
    - वो भगवान को पहचानता है
    उनसे मिला है, बात की है।
 
मैं हैरान था।
पूछा - कहाँ देखा?
कैसे मिले? कैसे पहचाना?'
 
बोला - जब कभी घूमकर देखता हूँ
पाता हूँ अपने दो पदचिन्ह
साथ ही दो और पद चिन्ह।
वो भगवान के होते हैं
जो हमारे साथ चलता है।
 
एक बार बहुत परेशानियों में उलझा था
जब मुड़कर देखा
मेरे पीछे चार नहीं दो पदचिन्ह थे
 
मैं घबराया
सोचा भगवान ने साथ क्यों छोड़ा?
क्या भूल हुयी मुझसे?
मैंने ऐसा क्या किया
जो उन्हें ठीक नहीं लगा?
 
ध्यान कर याद किया भगवान को
उन्हें बुलाया और यही प्रश्न किया।
 
भगवन हँसकर बोले-
मैं दुनिया में तुझे लाया हूँ
तेरा साथ कैसे छोड़ूँगा
मैं हमेशा तेरे साथ चलता हूँ।
मैं कभी पीछे चलता हूँ
कहीं तुम लड़खड़ाओ तो सम्हालूँ
कभी आगे चलता हूँ रास्ता दिखाता।
क्या तुम नहीं देखते - चार पदचिन्ह'
 
मैने कहा - भगवन!
जब देखता हूँ चार चिन्ह
खुश होता हूँ तुम साथ हो
पर आज जब देखा बस दो चिन्ह
घबराया, सोचा तुम नाराज़ हो
मुझे मंझधार में छोड़ गये।
क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?'
 
भगवान बोले - 
आजकल तुम परेशानी में हो
संकट से घिरे हो,
तुम घबरा गये हो
इसलिये मैं अकेला चलता हूँ
तुम मेरी गोदी में रहते हो।
पदचिन्ह चार नहीं दो बनते हैं
तुम मेरी गोदी में रहते हो।

दिल्ली – तब और अब

दिल्ली सुन्दर थी
कितनी मनमोहक थी
सब का दिल हर लेती थी
दिल-ली, दिल्ली कहलाती थी


सुन्दर घना जंगल होता था
वन्य जन्तुओं से भरा होता था
हवा साफ सुन्दर होती थी
निर्मल जल की धारा बहती थी
जमी नहीं रहती थी
जम-ना, यमुना कहलाती थी
इन्द्रलोक के टक्कर की थी
इन्द्रप्रस्थ कहलाती थी
धरती पर कोई स्वर्ग बना था
यहीं यहीं यहीं बना था।


न बचा कोई कट गये जंगल सभी
फिर जीव-जन्तुओं की बारी आयी
वो भी अब तो नहीं रहे
दूषित हवा हुई है कितनी
गन्दी कितनी सड़कें रहतीं
नाली में अटकी कीचड़ रहती

धुँआ गन्दगी फैली रहती
सड़कों पर गाड़ी अटकी रहती
जल स्तर नीचे खिसकता रहता
यमुना का पानी गन्दा अब रहता

यह यम की बहना है
पता सभी को इसका रहता
इन्द्र लोक अब नहीं यहाँ पर
कूड़ा-कचरा फैला है

अब देख इसे सब कहते है
क्यों धरती को हम मृ्त्युलोक कहते हैं।


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शाहजहां ने दीवाने खास में लिखवाया था
गर फिरदौस बर-रू-ए ज़मीं अस्तु ।
अमी अस्तु, अमी अस्तु, अमी अस्तु।।

बुधवार, 14 सितंबर 2022

कैनकिड्स के साथी

नित नये-नये ये काम करे
नित नये-नये ये रंग भरे
नाक पर ग़ुस्सा रहता है इसके
पर झटपट सब को शांत करे।

नेह लिए बोली में भरे
काम भी करती सभी खरे
सीधा-सादा नहीं समझना
ये नाक में सब के चने भरे।

शिवा ने दिया वर मोहे है
मैंने घर भी संभाल लिया है
पर काम नहीं छोड़ा है मैंने
सब को पल्लू में बाँध लिया है।

रूप रंग में न्यारी सबसे
रंग ढंग में प्यारी सबसे
दौड़ लगाती नीचे ऊपर
हंस कर झटपट काम करे।

मोह लिया है सबको इसने
काम भी सारा सीखा है इसने
इसको बच्चा नहीं समझना
लंबी दौड़ में जाना है इसने।

राम लला जी नाम है इनका
सबसे अलग ही काम है इनका
ये जल्दी-बाजी कभी न करते
पर काम टका टक रहता इनका।

संजय ने रास्ता दिखलाया
काम सभी यह छोड़कर आया
दीन दुनिया से नहीं कुछ लेना
जो बोला बस वो कर लाया।

कल्पना की कल्पना करो तुम
सुबह करो तुम, शाम करो तुम
उसकी दक्षता की कल्पना मगर
कभी भी कर नहीं पाओगे तुम

हरि ईश जहां पर रहता है
हर शीश वहाँ पर झुकता है
तुम इसको मानो, मत मानो
अनहोनी को होनी करता है

धनश्री, लक्ष्मी जी को कहते हैं
यह प्रधान सभी से, पहले आतीं हैं
भारत के कौने- कौने में जाती
यह कष्ट सभी के हर लेती हैं

सोने की मोनाल को ‘सोनल' कहते हैं
यहां वहाँ सब ओर जहां में चहके है
जहां कहीं भी, जब भी तुम जाओगे
अमिट छाप बस इसकी पाओगे

मुकुल सदा ही कूल रहे है
'मार' नहीं यह 'वाह' करे है
भीष्म सरीखा खड़ा अकेला
विपदायें यह दूर करे है

श्रीनाथ का द्वार खुला है
श्रद्धा से जब दस्तक दोगे
कष्ट तुम्हारे जो भी होंगे
दूर सभी वो झटपट होंगे

हंसता चेहरा शोक नहीं है
अनुभव का भंडार भरा है
जो वृक्ष फलों से लद जाता है
बस वो ही तो झुक पाता है!

व्यस्त काम में अपने हरदम
पर मीत सभी की बनी हुई है
अमित भंडार भरा महाजन
गिन्नीओं में सब को तोले है

ऋतु अच्छी है ठंड नहीं है
घिस कर चंदन रोज लगाओ
अंकित अपनी छाप करो तुम
दीपक को तुम रोज जलाओ

सुमित सरीखा मित्र सभी का
कपिल को कैसे भूल मैं पाता
अजय पुकारो तुम सब इसको
बिजय सदा ही है यह पाता

मीना जी हैं कभी न थकती
पढ़ा लिखा कर सबको रखतीं
निराश, हताश कोई न होए
हूँ माँ जी इसका ध्यान हैं करतीं

डरो नहीं तुम निर्भय रहना
कपीश नाम की माला जपना
अंश नहीं तुम पूरी करना
प्रकाश पुंज दिल में तुम रखना

विश्व जीत कर तुम आओगे
लोग प्रदान भी कलश करेंगे
तोड़ सितारा  घर लाओगे 
जग में अपना नाम करोगे

पप्पू जी की हंसी न करना
है पेट सभी का इनको भरना
आदित्य सरीखे चलते जाना
कर्तव्य मार्ग से कभी न हटाना

लो माना हमने भी, सच है
पूनम का चाँद बड़ा होता है
पर नित घटता है, बढ़ता है
वो सदा एक सा कब रहता है

- Friends! 
Here is a challenge. One who is first to recognize all the people correctly will get a signed copy of this poem. Best wishes.

रविवार, 9 जनवरी 2022

स्वप्न य साकार

वो हवा के झोंके सा आया
और बस छू कर चला गया
वो स्वप्न था? साकार था?
मैं तो सोचता ही रह गया।

रविवार, 26 सितंबर 2021

बेटी का दिन

आज का दिन ‘बेटी का दिन
जग में सब कहते हैं इसको
मुझको भी बोला जब सब ने
सोच में डूबा बैठा हूँ मैं
-    कौन दिवस बीता था ऐसे
जब याद न उसकी आयी मुझको

गोद में वो खेला करती है
किलकारी से भर देती है
जब भी हम घर पर आते हैं
हंसकर वो हम से मिलती है

ध्यान लगाकर वो पढ़ती है
अच्छे नंबर वो लाती है
नहीं असंभव कुछ भी उसको
सभी काम वो कर पाती है
डॉक्टर है वकील भी  है
अध्यापक है अफ़सर भी है
नभ में ऊपर वो उड़ती है
सेना मैं भी वो लड़ती है
कोई क्षेत्र बचा न उससे
बच्चों को वो ध्यान धरे है
बूढ़ों का भी मान  करे है

इन बातों को सोच समझ कर
मेरा मत कुछ अलग बना है
आज वो तुम सब से कहना है
एक दिवस की नहीं है बिटिया
वो सदा बसे है मन में मेरे
हर दिन उसके नाम लिखा है

रोज़ सुबह जब उठता हूँ
‘बेटी का दिन है’ - कहता हूँ
‘बेटी का दिन है’ - कहता हूँ

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

कितने निष्ठुर हो तुम

कितने निष्ठुर हो तुम 

किसी की सुनते नहीं हो 
किसी को देखते नहीं हो 
कोई कितना भी चीखे 
तुम्हें कोई चिंता नहीं, परवाह नहीं 

किसी की मृत्यु का समाचार 
तुम्हें कोई अंतर नहीं पड़ता 
वो मर गया – अपनी बला से 
उसको मार दिया – उनकी बला से 

तुम देखते तो होगे सब कुछ 
सुनते होगे जनता का शोर 
कैसे सह लेते हो सब 
फिर भी चुप रह जाते हो 

समझते हो सहनशील हो 
नहीं सहनशील नहीं हो 
बस संवेदनहीन हो तुम 
बहुत निष्ठुर हो 

तुम बड़े हो, 
दिल को बड़ा करो ! 
अपने आप से पूछो 
– क्यों हो तुम ? 
   इतने निष्ठुर क्यों हो तुम?