बुधवार, 14 नवंबर 2018

पत्थर का है तो हुआ करे, दिल तो है
बदनसीब हैं जिन्हें ये भी मयस्सर नहीं

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पत्थर का ही सही मगर दिल तो है
वो कितने हैं जिन्हें ये भी नसीब नहीं

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

क्या मेरा दर्द है


मुझको तो मर्ज़ है, और मर्ज़ का पूरा दर्द है
किसी को तवक्को ही नहीं, मेरा क्या दर्द है


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विश्व हॉस्पिस व पॉलियेटिव देखरेख दिवस पर लिखी
Written on the World Hospice & Palliative Care Day 

अधिकार हमेशा अपना रखना


मैं नहीं चाहता
तेरे मन पर अधिकार रहे मेरा अपना
तेरा मन तो है तेरा अपना

जब चाहो जो चाहो जैसे चाहो करना
करना जो चाहो, चाहो मत करना
बस मन पर अपने अपना काबू तुम रखना
फिर जो भी तुम चाहो करना, करना मत करना

जीवन में जब आ जाये कोई अपना
छा जाये कोई वो तुम पर चाहे जितना
यह अधिकार नहीं तुम उसको देना
बोले तुमको
-        क्या करना, कैसे करना, कब करना

मुश्किल हो कोई, आये कोई भी दुविधा
राय सभी की लेना, उसकी भी सुनना
बात सभी की धरना मन में, पूरा विश्लेषण करना
तब सोच समझ कर निर्णय अपने मन से ही लेना

याद रहे - तुम स्वतंत्र हो, हरदम ऐसे ही रहना
चाहे कोई आ जाये, कितना भी हो जाये अपना
मन पर अपने अधिकार हमेशा अपना ही रखना
मन पर अधिकार हमेशा अपना ही रखना

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

धूप में तपिश नहीं तो क्या

धूप में तपिश नहीं तो क्या, उसकी रोशनी से काम ले
जो न मिला उसका क्या गिला, जो है उसको संवार ले

सोमवार, 13 अगस्त 2018

नहीं घटेगा बढ़ जायेगा

नहीं अगर मैं कुछ बोलूँ -
क्या घटता है मन में मेरे।
कैसे जानेगा कोई
क्या घटता है मन में मेरे ?

सच अगर नहीं बोलूँ - 
क्या घटता है मन में मेरे।
फिर कैसे जानेगा कोई
क्या घटता है मन में मेरे ?

सच तो यह है
जो घटता है मन में मेरे
थोड़ा आगे या पीछे
वैसा ही कुछ 
घटता है मन में तेरे।

अलग- अलग जब रहते हैं
नहीं पता मुझको चलता है
क्या घटता है मन में तेरे
तुझको भी कहां पता पड़ता है
क्या घटता है मन में मेरे

मुझको लगता है अच्छ हो 
हम जब मिल सब बैठैंगे
मिलजुल कर फिर सीखेंगे
तू मुझको बोले मैं तुझको बोलूं
मैं तुझसे सीखूं, तू मुझसे सीखे
अनुभव से अनुभव जुड़ जायेगा
नहीं घटेगा बढ़ जायेगा।

अनुभव से अनुभव जुड़ जायेगा
फिर नहीं घटेगा बढ़ जायेगा।


आदरणीय लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ताई ने अध्यक्षीय शोध कदम (अशोक - एस आर आई) की तीसरी वर्षगांठ पर जो कहा उसको लिखने की एक कोशिश 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

हार - जीत?

अपनों से जीते तो क्या जीते?, 
अपनों से हारे तो क्या हारे?
नदी जब सागर में जा मिले,
कौन जीते और कौन हारे?

विषेश: बहुत दिन से यह विचार रहा है, अब सोचा कि इसे लिख दिया जाये। 

रविवार, 31 दिसंबर 2017

अफवाहें हैं, भड़काने की नाकाम कोशिश हैं

अफवाहें हैं सब
कोई हुक्म नहीं है किसी का
कि पाबंदियां लग जाएं सब ओर

हवाओं को है आज़ादी
बहें जिधर भी, जिस ओर वो चाहें
रफ्तार ले लें, वो जो उनके मन में आये

लहरें भी आज़ाद हैं
उठें और पटक लें सिर अपना
जितना वो चाहें
पत्थरों को तोड़ वो डालें
पाबंदी नहीं है कोई
किनारे लांघ लें और तोड़ डालें
जो कुछ राह में आये
पूरी छूट है उनको
कर लें अपनी मनमानी वो
धरा पर वो छा जायें

समुंदर से कहो – आज़ाद वो भी है
रोक नहीं है उस पर भी कोई
भर ले सैलाब अपने अंदर, जितना भी समा पाये
उछाल ले आये जितना वो चाहे
मचाले वो भी तबाही
जितनी उस के मन में आये

रोक नहीं है कोई किसी पर
कर लें सब, जो भी जिसके मन में आये

कोई हुक्म नहीं है किसी का
कि पाबंदियां लग जाएं
ये सब अफवाहें हैं
भड़काने की नाकाम कोशिश हैं

बस कि एक गुज़ारिश है –
कि किनारों की भी सुन लें
क्या कहर उन पर गुज़री है
क्यों वो दिन-रात रोते हैं?
तोड़ डाले हैं घर सभी के
जो मान करते थे समुंदर का
उसकी पूजा करते थे
हट के उससे दूर रहते थे
लहरें उठीं, और इतनी बड़ी
कि खा गयीं सभी को
दूर तलक पीछा किया, फिर मार डाला
जो भी हाथ में आया
नहीं है कोई हक उनको
इस धरा पर रहने का और जीने का?
कि आज़ादियां हैं –
बस लहरों को और समुंदर को

हवाओं को भी आज़ादियां हैं –
कर लें अपने मन की, मन में जो आये
बस कि ऐलान कर दो
कह दो परिंदों से -
नहीं है हक उन्हें कोई
कि वो घर अपना बना पायें
चार तिनके बीन कर पेड़ों पर बस जायें
नहीं है कोई हक उनको
कि चैन से रहें, अमन के गीत वो गायें
पालकर बच्चों को वो अपने
कोई सीख दे पायें
-    कि मिल-जुल कर रहना है

पाबंदियां नहीं हैं कोई
कि बस ये तकाज़ा इंसानियत का है
जब हम अपना हक जताने जायें
तो दूसरे का हक न मारा जाये

ये कोई पाबंदी नहीं, बस ज़हन में रखना कि
मेरा हक, मेरा घर, मेरा सलीका
मेरा मन, मेरा कुनबा, मेरा गांव
ये सब मेरा-मेरा कहने में
सिमट कर न रह जाऊं कहीं मैं
भूल ना जाऊं कहीं कि स्वच्छंद रहने में
खुद अपना कानून लिखने में
तबाह कितने हुए थे, घर कितने के उजाड़े थे

अजब ये लोग हैं
जो भड़काने की बात करते हैं
भूल जाते हैं - कि लहू कितनों का बहा था
कितने मरे थे, कितने बरबाद हो गये
कि जब कुछ लोग कहते थे –
कि बस आज़ाद मैं ही हूं
नहीं है कोई हक किसी दूसरे को
इस धरा पर सांस लेने का
ये मैं ही तय करूँगा
कौन जीयेगा, कौन मरेगा

याद रहे, यह धरती सभी की है
हक है सभी को इस पर रहने का
हक है सभी को खुल कर जीने का
हमें मिल-जुल कर रहना है
सब को सिखाना है -
हक है तुम्हें कि तुम हाथ अपना
घुमालो जिस ओर तुम चाहो
मगर ध्यान में तुम्हारे रहे हमेशा
कि चोट किसी दूसरे को न आये
और हक न किसी का मारा जाये

बस कि अफवाहें हैं
कोई पबन्दियां नहीं
आज़ादी है सभी को
कर लें जो भी उनके मन में आ जाये
ध्यान में अपने मगर रखना जरूर
कि चोट किसी दूसरे को न आये
कि चोट किसी दूसरे को न आये