गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

दिमाग घूम जाता है मेरा

दिमाग घूम जाता है मेरा
जब कभी तुम पास होते हो मेरे

मैं भूल जाता हूं
कौन हूं मैं
क्या करता हूं
क्यों करता हूं

खो जाता हूं
नयी दुनियां में
पूर्णत: तनाव मुक्त
न कोई चिंता न परेशानी
न कोई खतरा

फिर जुट जाता हूं
दूनी लगन चाव और मेहनत से
अपने काम में पूरी तरह मशकूल

भूल जाता हूं –
तुम मेरे पास हो

बस दिमाग घूम जाता है मेरा
जब कभी तुम पास होते हो मेरे

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

प्रेम द्विवेदी सच बोला था!

प्रेम द्विवेदी बोला था
- सत्य वचन हो, कर्तव्यनिष्ठ हो
परोपकार में ध्यान लगाओ
कथनी-करनी एक बना लो
जो करना हो वो बोलो
जो बोलो वो कर डालो”

मंत्र हमेशा साथ रहा यह
अपनाया इसको, जीवन में ढ़ाला।
कभी-कभी मैं थक जाता हूँ
निराश अकेला सोचा करता हूँ
- वो सच बोला था ?”

देख रहा हूँ वो भेड़िये
जो छुपे भेड़ की खाल ओढ़कर
यहाँ-वहाँ पर खड़े हुये हैं।
वो देखो वे श्वान वहाँ पर
तैयार ताक में खड़ा हुआ है
झपट पकड़ लेगा वो बिल्ली
जो बैठी है घात लगाकर
उस चूहे को ताक रही है।

वो मदमस्त चला आता है हाथी
चूर नशे में तनकर कितना
कुचल-मसलकर रख देगा
कहीं कोई जो रस्ता रोकेगा।

वो देखो, वो गिद्ध वहाँ बैठे कितने हैं
मरे गिरों को भी नोचेंगे।
वो दूर सिंह चला आता है निर्भय
जब आता है उसके मन में
मार गिरा देता है, खा जाता है
नहीं किसी का डर है उसको

बेताज बादशाह बन बैठा है
कौन उसे गद्दी से खींचेगा?
कौन उसे रोके-टोकेगा?
कौन नकेल लगा पायेगा?

वो घोड़ा दौड़ रहा हिरनों के पीछे
ले मालिक को ऊपर अपने
खुद मांस-मछली कभी नहीं ये खाता
पर मालिक से है उनको मरवाता

मालिक उसका है अजब निराला
खेल-खेल में मारेगा
चमड़ी में भूसा भरवा देगा।
नहीं किसी का डर है उसको
नहीं किसी से प्रेम है उसको

मैं जब देखा करता हूँ यह सब
सोचा करता हूँ -

प्रेम द्विवेदी सच बोला था”

तुमको क्या लगता है -

वो सच बोला था ?”

बुधवार, 15 जुलाई 2015

फुटकर द्वैतिकाऐं

देखा जो  उनको , घर  पर  रकीब  के।
नज़र से हमको अपनी , ऐतबार उठ गया।।

कहें किससे, वो गिले शिकवे शिकायत सभी।
न तुम करीब हो, न मैं खुद अपने ही पास हूँ।।

मिन्नतें  कीं   हैं  इस कदर ।
रब दस बार मिल गया होता।।

कैसे कहदूँ वो बात कभी जो तुमसे कहनी थी।
तुम वो नहीं रहे और अब, मैं भी बदल गया हूँ।।

सच नहीं है कि मुहब्बत न रही मुझे, या मैं बदल गया हूँ।
दिल में अपने ही देखिये जो पहले था, अब नहीं  है वो।।

हम न कह पाये तो क्या, तुमने देखा था हमेशा।
फिर क्यों रह गया दफन, इश्क सीने में हमारे।।

कोशिशें तमाम कीं, ता उम्र लगा रहा।
न बुझ सकी, जो लगी सीने में थी हमारे।

मैंने पूछा भगवन से, बोलो! - कैसे तुम्हारी भक्ति हो।
बोले धूप दीप न लकड़ी-चन्दन मन के अन्दर बाती हो।।

सोचा था कहाँ से लाकर देगा, इतना जो माँग लिया था मैंने।
वो खुदा है, देकर तुम्हें, उसने बक्श दी हर एक दौलत मुझको।।

सोचा था कहाँ से लाकर देगा, इतना जो माँग लिया था मैंने।
वो खुदा है, देकर तुम्हें, मुझको बक्शी हर एक दौलत उसने।।

रब जाने क्या रुख लेगी महफिल, क्या हश्र बनेगा मसले का।
इस महफिल के सभी जानवर, अपनी ही बोली में बोल रहे हैं।।

तरक्की दर तरक्की , इस मकाँ पर आ गया है आदमी ।
अदमी  को  आदमी , अब  लगता नहीं  है  आदमी।।

आदमी और  इन्सान में, अब  फर्क  है  इतना।
इन्सान को, पहचानता बिलकुल नहीं है आदमी।।

माना जी भर गया आपका, तबियत बहल गयी।
अब इस खाकसार को, यूँ बे-गैरत न कीजिये।।

मजनू सी दीवानगी नहीं, न रोमियो सी कुर्बानगी, न है फरहाद सा हौसला।
शाहजहाँ सी दौलत भी नहीं, यकीनन अपना है  अन्दाज़-ए-इश्क और।।

तुमसा ही एक ज़र्रा हूँ, मेरा नाम न पूछे कोई।
मेरे काम को देखो, मेरे काम से जानो मुझको।।

परवाने खाक हो गये, किसी ने खबर भी न ली।
शम्मा का जलना, मगर हर एक शक्स ने देखा।।

हजारों को हजम करके, शम्मा  रोशन  चिराग है।
कसूर क्या था बिचारों का, जो नाहक खाक हो गये।।

सार है सब ग्रंथका, सबसे बड़ा यह सत्य है।
कर भला जो और का, तेरा भला हो जायेगा।।

दिमाग से सोचो, फिर खून पसीने से सींचो उसको।
खुद अपने आप तो, हाथों पर लकीर नहीं बनती।।

मैं मझधार में तूफाँ से उलझा, तू हँसता है साहिल पे खड़ा।
एक बार तो आकर देखा यहाँ, यह काम नहीं है बचकाना।।

हर मुँह में रोटी होगी, सबके हाथों को काम मिलेगा।
ये नक्शा है मंजिल का मेरी, आँखों में आया ख्वाब नहीं है।

कस्तूरी हिरन ढूँढते हैं, चारों ओर बारबार लगातार।
जानते नहीं कि उन्हीं के अन्दर है, जिसे ढूँढते हैं वो।।

घर तमाम रोशन, कर दिया चिराग ने।
फिर इसे आफताब, क्यों न कहें हम।।

कैसे कहूँ तुमको, क्या सोचोगे?
हाँ कहो पहले, तो बताऊँ तुमको।।

शनिवार, 7 मार्च 2015

क्यों हूँ?


सत्य की पहुँच से दूर है, जहाँ हूँ मैं।
जहाँ हूँ मैं वहाँ कोई आवाज़ नहीं आती

नहीं आती है कोई चीख किसी की
किसी की सुनता नहीं मैं अकेला हूँ

मैं अकेला हूँ, मेरे साथ नहीं है कोई
है कोई नहीं यहाँ, मेरी आत्मा भी नहीं है

नहीं है मेरा ज़मीर, मर गया है
गया है सब कुछ कहाँ? मुझे नहीं पता

नहीं पता - कौन हूँ मैं, क्यों हूँ?
क्यों हूँ? जहाँ परछाईं भी नहीं सत्य की।

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

लोग मिलते हैं गुज़र जाते हैं
हम उनकी यादों में सिहर जाते हैं
इसलिए बंद कर दी यादों की क़िताब
फिर भी कुछ वरक़ बिखर जाते हैं
                            -नरेश वैद

कुछ लोग हैं जो मिलते हैं और गुज़र जाते हैं
पर हमेशा के लिये यादों में बसे रह जाते हैं

उनकी तारीफ करें हम जितनी, चाहे जितनी
अल्फाज़ हमेशा ही मगर कुछ कम रह जाते हैं
                                                 - हर्ष कुमार

गुरुवार, 23 मई 2013


तमाम उम्र साये की तरह कोई भी मेरे साथ न रहा.
किसी से उम्मीद क्या रखूं साया भी मेरे साथ न रहा.

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

अब जो होगा अच्छा होगा

टूटी सड़क
बिना बिजली का खम्बा
गन्दा पानी भरा गड्रडा
बदबूदार दूषित हवा
दूर तक अन्धकार
घोर अन्धकार
ऊपर से घना कोहरा।

हाथ को हाथ नहीं सूझता
हाथ को हाथ नहीं सुहाता
झपट कर छीन लेता है
कूड़ा-कचरा जो कुछ हो।

आदमी दुशमन है आदमी का
चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या
सब होता है यहाँ
व्यापार की तरह।
बस व्यापार नहीं होता
ठप हो गया है।

स्कूल कालेज शान खो चुके हैं
बाकी सब मान खो चुके हैं।

मैं हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ।
खुश हूँ।
हर बुरी बात पर खुश हूँ
सोचता हूँ - इससे बुरा क्या होगा
अब जो होगा अच्छा होगा''


[1] उन शहरों की दुर्दशा पर जो कभी बहुत सम्पन्न होते थे।