गुरुवार, 6 नवंबर 2014

लोग मिलते हैं गुज़र जाते हैं
हम उनकी यादों में सिहर जाते हैं
इसलिए बंद कर दी यादों की क़िताब
फिर भी कुछ वरक़ बिखर जाते हैं
                            -नरेश वैद

कुछ लोग हैं जो मिलते हैं और गुज़र जाते हैं
पर हमेशा के लिये यादों में बसे रह जाते हैं

उनकी तारीफ करें हम जितनी, चाहे जितनी
अल्फाज़ हमेशा ही मगर कुछ कम रह जाते हैं
                                                 - हर्ष कुमार

गुरुवार, 23 मई 2013


तमाम उम्र साये की तरह कोई भी मेरे साथ न रहा.
किसी से उम्मीद क्या रखूं साया भी मेरे साथ न रहा.

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

अब जो होगा अच्छा होगा

टूटी सड़क
बिना बिजली का खम्बा
गन्दा पानी भरा गड्रडा
बदबूदार दूषित हवा
दूर तक अन्धकार
घोर अन्धकार
ऊपर से घना कोहरा।

हाथ को हाथ नहीं सूझता
हाथ को हाथ नहीं सुहाता
झपट कर छीन लेता है
कूड़ा-कचरा जो कुछ हो।

आदमी दुशमन है आदमी का
चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या
सब होता है यहाँ
व्यापार की तरह।
बस व्यापार नहीं होता
ठप हो गया है।

स्कूल कालेज शान खो चुके हैं
बाकी सब मान खो चुके हैं।

मैं हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ।
खुश हूँ।
हर बुरी बात पर खुश हूँ
सोचता हूँ - इससे बुरा क्या होगा
अब जो होगा अच्छा होगा''


[1] उन शहरों की दुर्दशा पर जो कभी बहुत सम्पन्न होते थे।