गुरुवार, 24 मई 2012

यह जगह अजब निराली है

पिछ्ले सप्ताह मैं जयपुर गया था और वहां एक निराली जगह देखी
शब्दों में उसका बयां मुश्किल है. यह एक कविता वहीं लिखी थी
यह शायद आपको बता पाये कि यह जगह कैसी है. आप नैट पर
उसे देखें http://www.treehouseresort.in


यह जगह अजब निराली है

-   पेड़ों पर रहते हैं
          लकड़ी के घर में
          चिड़ियों के जैसे

कमरे में हो लगता है घर में हो
बाहर निकलो जंगल सा लगता है
पर इंतज़ाम सभी यहां रहता है
जंगल में मंगल सा लगता है

चिड़ियों को देखो इतराते पेड़ों पर
अठखेली करतीं हैं कितनी
सुन लो सब बातें उनकी
खुश हैं कितनी गाना गातीं
मस्ती में उड़तीं ऊपर, नीचे आतीं 

तुम भी आओ दौड़ लगाओ
उछलो कूदो गाना गाओ
सांस को अपनी, जोर से खींचो
अच्छी है ये, साफ भी कितनी
रोज की मरा-मारी छोड़ो
आफिस भूलो, घर को त्यागो
एक बार फिर खुशी से जी लो
अपने मनको हलका करलो
अपनी बैट्री चार्ज भी करलो

मनको अपने हलका करलो
मनको अपने हलका करलो

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

झूंठ को अपनायें

झूंठ कितना प्यारा होता है
हसीन दिलकश जांनशीन होता है
छुपा देता है सच को
परदे में रखता है
सामने आने से रोक देता है
जितना चाहें दिखाता है
बाकी अपने में छिपा लेता है

सच ना जाने कैसा हो
कड़वा, भयानक, डरावना, घृड़ित
ना जाने कैसा हो
हम डर जायें?
सहम जायें?
ग़म से मर जायें
न जाने हम क्या कर जायें
अगर सच के सामने आ जायें

मेरी माने सच को रहने दें
झूंठ को अपनायें
ये कलयुग की संजीवनी है
इसे पनपायें बढायें
बस झूंठ को अपनायें

क्यों पूछा तुमने मुझसे

क्यों पूछा तुमने मुझसे –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?


उठते – बैठते छवि तुम्हारी
आखों में रहती है मेरे
तुम मेरी सांसों में हो
मेरे प्राणों में बसती हो
नहीं पता क्या तुमको ?
कितना प्यार मुझे है तुमसे?

फिर मुझसे क्यों पूछा तुमने –
क्या प्यार मुझे है तुमसे?