हमने जो सूरत पाई है, न जाने कैसी पाई है
जो भी हमको देखता है, गधा हमको समझता है
दिया तुमने सभी को, ना जाने क्या क्या कुछ
मगर यही मंज़ूर तुमको था, यही किस्मत हमारी है
गिला है न शिकवा कोई, जो मिला कबूल हमको है
बस एक दुआ हमारी है, बाली से बड़ा वरदान हमको हो
मुकाबले में जब कभी कोई भी हमारे सामने हो
आधा नहीं पूरा गधापन हमारा उसी के सिर हो
यह मेरी कविताओं का छोटा संग्रह है। अपने विचार जरूर व्यक्त करें मुझे प्रसन्नता होगी।
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
सन्नाटा है, अब यहां चोरी नहीं होती
कुत्ता भौंकता है
वो सो नहीं पाता
दिन – रात जागता है
पड़ा सोचता है
कुत्ता क्यों भौंकता है ?
शायद कुत्ता नहीं जानता
वो दिन गये जब चोर आते थे
रात को दबे पांव आते थे
कोई आहट न हो, घबराते थे
कुत्ते भौंकें तो भाग जाते थे
लोगों की जाग से डरते थे
पकड़े जाने पर पिटने का खतरा था
चोर मीनार पर लटकायेंगे
जनता में बदनामी होगी, डरते थे
चोरी कभी-कभी करते थे
सबसे डर कर, छुपकर रहते थे
हवा बदल गयी है अब
चोर नहीं आते यहां,
बस डाकू बसते हैं
दिन दहाड़े डाका डालते हैं
थाने में डाके की रपट नहीं होती
डाकू को कभी सज़ा नहीं होती
डाकू किसी से नहीं डरते
कुत्तों के भौंकने से खुश होते हैं
अच्छा है लोग जाग जायेंगे
उनका लोहा मानेंगे, बड़कर स्वागत करेंगे
आने का नज़राना, जाने का शुक्रिया देंगे
यकीन है उन्हें, पकड़ में नहीं आयेंगे
आये भी तो छूट जायेंगे
अपने बच्चों को सिखाते हैं
जो मन आये कर लो
जब चाहो जितना लूट लो
लोग चुप हैं, सहमे रहते हैं
सन्नाटा है हर ओर
अब यहां चोरी नहीं होती
बस डाके पड़ते हैं
कोई चोर नहीं है यहां
कभी चोरी नहीं होती
वो सो नहीं पाता
दिन – रात जागता है
पड़ा सोचता है
कुत्ता क्यों भौंकता है ?
शायद कुत्ता नहीं जानता
वो दिन गये जब चोर आते थे
रात को दबे पांव आते थे
कोई आहट न हो, घबराते थे
कुत्ते भौंकें तो भाग जाते थे
लोगों की जाग से डरते थे
पकड़े जाने पर पिटने का खतरा था
चोर मीनार पर लटकायेंगे
जनता में बदनामी होगी, डरते थे
चोरी कभी-कभी करते थे
सबसे डर कर, छुपकर रहते थे
हवा बदल गयी है अब
चोर नहीं आते यहां,
बस डाकू बसते हैं
दिन दहाड़े डाका डालते हैं
थाने में डाके की रपट नहीं होती
डाकू को कभी सज़ा नहीं होती
डाकू किसी से नहीं डरते
कुत्तों के भौंकने से खुश होते हैं
अच्छा है लोग जाग जायेंगे
उनका लोहा मानेंगे, बड़कर स्वागत करेंगे
आने का नज़राना, जाने का शुक्रिया देंगे
यकीन है उन्हें, पकड़ में नहीं आयेंगे
आये भी तो छूट जायेंगे
अपने बच्चों को सिखाते हैं
जो मन आये कर लो
जब चाहो जितना लूट लो
लोग चुप हैं, सहमे रहते हैं
सन्नाटा है हर ओर
अब यहां चोरी नहीं होती
बस डाके पड़ते हैं
कोई चोर नहीं है यहां
कभी चोरी नहीं होती
दमकता दिया
रात का समय था
चारों ओर अंधकार था
आसमान पर बदली थी,
रोशनी का सुराग न था
गंतव्य पर हमारा ध्यान था
हमें समय का ख्याल था
वो हाथ से फिसल रहा था
इसका पूरा अहसास था
दिमाग छुट्टी पर था
हमारा मन बेकाबू था
हम रास्ता जानते थे
मगर राह खो बैठे थे
तभी कहीं दूर कुछ दिखा
वो हमसे बहुत दूर था
ठीक से नहीं दिखा था
हमें बाद में पता चला
टिमटिमाता दिया था
उसमें तेल कम था
हवा तेज चल रही थी
उसकी लौ कांप रही थी
मगर हौसला बुलंद था
उसे हालात का ज्ञान था
छोटे होने का अहसास था
वो पूरी रात न चल पायेगा
न जाने कब बुझ जायेगा
हमेशा के लिये सो जायेगा
वो यह सब जानता था
वो खुद को खो रहा था
हमें रास्ता दिखा रहा था
बराबर लगातार जल रहा था
हमारे काफिले में वो कौन थे
किस तरह के, कहां के लोग थे
न जाने किस कुंठा से ग्रस्त थे
दिये में कमी खोज रहे थे
उसकी रोशनी में कमी थी
उसमें घी नहीं, तेल जलता था
वो मट्टी का बना था
सभी को बता रहे थे
सूरज से तुलना कर रहे थे
उसे छोटा और तुच्छ बता रहे थे
कहां सूरज का दमकता प्रकाश
कहां वो पिद्दी सा दिया
वो उसका काम क्यों करता है?
बार-बार यही पूछते थे
मैं ये सब देखता था
अचम्भे में सोचता था
कैसे लोग हैं अजीब लोग हैं?
दिखती राह नहीं चलते
सही राह नहीं चलते
दिये से कुछ सीखते नहीं हैं
वो इनके लिये जलता है
ये बेकार उससे जलते हैं
अजीब लोग हैं, ये कैसे लोग हैं?
चारों ओर अंधकार था
आसमान पर बदली थी,
रोशनी का सुराग न था
गंतव्य पर हमारा ध्यान था
हमें समय का ख्याल था
वो हाथ से फिसल रहा था
इसका पूरा अहसास था
दिमाग छुट्टी पर था
हमारा मन बेकाबू था
हम रास्ता जानते थे
मगर राह खो बैठे थे
तभी कहीं दूर कुछ दिखा
वो हमसे बहुत दूर था
ठीक से नहीं दिखा था
हमें बाद में पता चला
टिमटिमाता दिया था
उसमें तेल कम था
हवा तेज चल रही थी
उसकी लौ कांप रही थी
मगर हौसला बुलंद था
उसे हालात का ज्ञान था
छोटे होने का अहसास था
वो पूरी रात न चल पायेगा
न जाने कब बुझ जायेगा
हमेशा के लिये सो जायेगा
वो यह सब जानता था
वो खुद को खो रहा था
हमें रास्ता दिखा रहा था
बराबर लगातार जल रहा था
हमारे काफिले में वो कौन थे
किस तरह के, कहां के लोग थे
न जाने किस कुंठा से ग्रस्त थे
दिये में कमी खोज रहे थे
उसकी रोशनी में कमी थी
उसमें घी नहीं, तेल जलता था
वो मट्टी का बना था
सभी को बता रहे थे
सूरज से तुलना कर रहे थे
उसे छोटा और तुच्छ बता रहे थे
कहां सूरज का दमकता प्रकाश
कहां वो पिद्दी सा दिया
वो उसका काम क्यों करता है?
बार-बार यही पूछते थे
मैं ये सब देखता था
अचम्भे में सोचता था
कैसे लोग हैं अजीब लोग हैं?
दिखती राह नहीं चलते
सही राह नहीं चलते
दिये से कुछ सीखते नहीं हैं
वो इनके लिये जलता है
ये बेकार उससे जलते हैं
अजीब लोग हैं, ये कैसे लोग हैं?