Friday, August 6, 2010

शायद तुम नाराज़ हो मुझसे

सुबह सवेरे उठता हूं
नींद को झझकोड़ कर हटाता
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं

छट-पट तैयार
आफिस की भागम-भाग
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं

बॉस की सुनी
मातहद को सुनाई
दिनभर कोल्हू का बैल बना
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं

शाम, दिन छिपे वापस
थका-मांदा घर लौटता हूं
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं

फिर रात
वही घर, वही बिस्तर
करवट बदलता सोता हूं
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं

उम्र कट जायेगी यूं ही
घर-आफिस के बीच की दौड़
तुम्हारे ख्याल में गुज़र जायेगी

फिर भी न जाने क्यूं
मुझे लगता है –
तुम शायद नाराज़ हो मुझसे

आस-पास की चोरी
लूट-खसोट, मार-पीट
भष्टचार - चोर बाज़ारी
मंहगाई आत्याचार
मुझे क्यों नहीं दिखता ?
इन्हें हटाने के लिये मैं कुछ नहीं करता !

न जाने क्या सोचता हूं?
बस तुम्हारे ख्याल मैं रहता हूं
कभी-कभी सोचता हूं -
शायद तुम नाराज़ हो मुझसे

मैं क्यों कुछ नहीं करता
क्यों ख्याल में खोया रहता हूं ?
क्यों सपनों मैं सोया रहता हूं ?
मैं नहीं जानता

पर अक्सर सोचता हूं -
तुम बहुत नाराज़ हो मुझसे

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