छोटी बच्ची चहक उठी
चटक मटक कर बोली मुझसे
अॅं कल मेरे! क्या करते हो
कमरा तुमने बंद किया है
कुर्सी पर अकडे बैठे हो
दूर बहुत हो सब लोगों से
कोई बात नहीं तुमसे करता है
मिलने में भी डर लगता है
इस तरह अकेले बैठे ठाले
क्या मिलता है तुमको बोलो
मैं चुप, बिलकुल चुप था
सोच रहा था क्या बोलूं
ये बात पते की बोल रही है
कड़वा सच भी घोल रही है
इतने सारे लोग यहां हैं
भूख प्यास की फिकर नहीं है
घर जाने की किसको चिंता
चौबीस घंटे लगे हुए हैं
मुस्काई गुडिया
फिर बोली मुझसे –
कमरा छोड कर अंकल निकलो
बाहर जा कर सबको देखो
मिलकर उनके साथ में खेलो
कंधे से कंधा टकराओ
जोश में उनको लेकर आओ
हंसकर उनसे बात करो तुम
गलती सब की माफ करो तुम
गुस्सा बिलकुल करो नहीं तुम
हिल मिल कर सब साथ रहेंगे
मिल जुल कर सब काम करेंगे
झट पट - झट पट खत्म करेंगे
काम सभी फिर और करेंगे
प्यार भी तुमको और करेंगे
काम समय पर खत्म भी होगा
सबके दिल में खुशी भी होगी
नाम भले ही भूल वो जायें
काम हमेशा याद रखेंगे
मैं असमंज में सोच रहा था
सही गलत को तोल रहा था
गुड़िया ने दुविधा समझी
प्यार से मुझसे फिर बोली -
अंकल मेरे मान भी जाओ
कमरे से बाहर तो आओ
हंस कर सबको गले लगओ
चशमा अपना साफ करो तुम
नयी नजर से देखो अब तुम
मैंने उसकी बात को माना
कमरे से बहर मैं आया
चशमा अपना दूर किया
नयी नजर से देखा सब कुछ
हिला दिया फिर अंजर पंजर
बदला गया तब सारा मंजर
सबने मिल कर काम किया
खुशी – खुशी हर रोज किया
जल्दी जल्दी खत्म किया
नैया अपनी पार लगी तब
मंजिल को पाया सबने
उनको खूब सराहा सबने
अब जाने की बारी आयी
बार-बार मैं सोच रहा हूं -
कैसे दूं मैं तुम्हें विदाई?
क्या बोलूं?
क्या बांधूं के रख दूं साथ तुम्हारे?
गुड़िया फिर से नजर में आई
एक बात फिर जहन में आई
जो कुछ सीखा मैंने तुमसे
मैं वापस तुमको भेंट करूंगा
यह तोहफा मेरा साथ में रखना
कान खोल कर ध्यान से सुनना
तुम भी जब फंस जाओ कहीं पर
मेरी बातें ध्यान में रखना
काम सभी के साथ में करना
चशमा अपना बदल के रखना
नयी नजर से देखा करना
बस अपना चशमा बदल के रखना
चशमा अपना बदल के रखना
यह मेरी कविताओं का छोटा संग्रह है। अपने विचार जरूर व्यक्त करें मुझे प्रसन्नता होगी।
शनिवार, 19 मार्च 2011
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
अपने आप से नाराज़ हूं मैं
नाराज़ हूं मैं
बहुत नाराज़ हूं मैं
तुमसे नहीं, किसी और से नहीं
बस अपने आप से नाराज़ हूं मैं
क्यों नाराज़ हूं मैं?
जानता नहीं हूं मैं
मगर बहुत नाराज़ हूं मैं
मेरा कहा किसी ने सुना नहीं?
मेरा कहा किसी ने किया नहीं?
नहीं नहीं ऐसा नहीं है
मैंने कुछ भी कहा ही नहीं है
फिर भी बहुत नाराज़ हूं मैं
कुछ चाहा मिला नहीं?
नहीं मैंने कुछ चाहा ही नहीं
जो मिला, जितना मिला
बस उसी में खुश
पर फिर भी न जाने क्यों
बहुत नाराज़ हूं मैं
कहां आ गया हूं मैं
क्यों आ गया हू मैं
नहीं जानता –
रास्ता कहां है, जाना किधर है?
कहां जाउंगा? नहीं जनता
मगर जानता हूं चला जाउंगा
इस अंधकार से निकल
अपनी मंजिल तक पहुंच जाउंगा
पर न जाने क्यूं
बहुत नाराज़ हूं मैं
बस अपने आप से नाराज़ हूं मैं
बहुत नाराज़ हूं मैं
तुमसे नहीं, किसी और से नहीं
बस अपने आप से नाराज़ हूं मैं
क्यों नाराज़ हूं मैं?
जानता नहीं हूं मैं
मगर बहुत नाराज़ हूं मैं
मेरा कहा किसी ने सुना नहीं?
मेरा कहा किसी ने किया नहीं?
नहीं नहीं ऐसा नहीं है
मैंने कुछ भी कहा ही नहीं है
फिर भी बहुत नाराज़ हूं मैं
कुछ चाहा मिला नहीं?
नहीं मैंने कुछ चाहा ही नहीं
जो मिला, जितना मिला
बस उसी में खुश
पर फिर भी न जाने क्यों
बहुत नाराज़ हूं मैं
कहां आ गया हूं मैं
क्यों आ गया हू मैं
नहीं जानता –
रास्ता कहां है, जाना किधर है?
कहां जाउंगा? नहीं जनता
मगर जानता हूं चला जाउंगा
इस अंधकार से निकल
अपनी मंजिल तक पहुंच जाउंगा
पर न जाने क्यूं
बहुत नाराज़ हूं मैं
बस अपने आप से नाराज़ हूं मैं
सरफिरे
सर फिर गया था हमारा
गलती की थी हमने
बहुत बड़ी गलती
जान बूझ कर की थी
निकल पड़े थे नंगे हाथ
बढ़ती आग बुझाने
अनजान नहीं थे हम
लड़ाई आर – पार की थी
जानते थे एक ही बचेगा
बाजी जीत लेंगे या तबाह होंगे
शायद जीत कर भी तबाह होंगे
फिर भी कूद पड़े थे
अनजान नहीं थे हम
किसी तगमे का लालच नहीं था
किसी खिताब की चाह नहीं थी
कुछ कर दिखाना नहीं चाहते थे
बस फिजूल का शौक था
हम पूरे होश में थे
पर न जाने क्यों
अजब, शराबी सा नशा था
सबकी सलाह ठुकरादी
किसी की एक न चली
हम न माने
किसी तरह न माने
बस कूद पड़े
जानते न थे
यह अजब खेल है
हारेंगे तो सब मिलकर मारेंगे
जीतेंगे तो घेर कर मारेंगे
बस मौत लिखी है
सबके नाम लिखी है
कोई हट के मरता है
कोई सट के मरता है
कोई खा कर मरता है
कोई भूखा मरता है
बस मरते हैं सभी
जरूर मरते हैं सभी
अजीब खेल है
यहां हारने वाले को
चील कौवे भी नहीं छोड़ते
जीतने वाले की बलि देते हैं
न जाने क्यों
फिर भी बहुत सरफिरे हैं
कूद जाते हैं
न जाने क्यों?
गलती की थी हमने
बहुत बड़ी गलती
जान बूझ कर की थी
निकल पड़े थे नंगे हाथ
बढ़ती आग बुझाने
अनजान नहीं थे हम
लड़ाई आर – पार की थी
जानते थे एक ही बचेगा
बाजी जीत लेंगे या तबाह होंगे
शायद जीत कर भी तबाह होंगे
फिर भी कूद पड़े थे
अनजान नहीं थे हम
किसी तगमे का लालच नहीं था
किसी खिताब की चाह नहीं थी
कुछ कर दिखाना नहीं चाहते थे
बस फिजूल का शौक था
हम पूरे होश में थे
पर न जाने क्यों
अजब, शराबी सा नशा था
सबकी सलाह ठुकरादी
किसी की एक न चली
हम न माने
किसी तरह न माने
बस कूद पड़े
जानते न थे
यह अजब खेल है
हारेंगे तो सब मिलकर मारेंगे
जीतेंगे तो घेर कर मारेंगे
बस मौत लिखी है
सबके नाम लिखी है
कोई हट के मरता है
कोई सट के मरता है
कोई खा कर मरता है
कोई भूखा मरता है
बस मरते हैं सभी
जरूर मरते हैं सभी
अजीब खेल है
यहां हारने वाले को
चील कौवे भी नहीं छोड़ते
जीतने वाले की बलि देते हैं
न जाने क्यों
फिर भी बहुत सरफिरे हैं
कूद जाते हैं
न जाने क्यों?
शुक्रवार, 6 अगस्त 2010
शायद तुम नाराज़ हो मुझसे
सुबह सवेरे उठता हूं
नींद को झझकोड़ कर हटाता
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
छट-पट तैयार
आफिस की भागम-भाग
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
बॉस की सुनी
मातहद को सुनाई
दिनभर कोल्हू का बैल बना
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
शाम, दिन छिपे वापस
थका-मांदा घर लौटता हूं
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
फिर रात
वही घर, वही बिस्तर
करवट बदलता सोता हूं
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
उम्र कट जायेगी यूं ही
घर-आफिस के बीच की दौड़
तुम्हारे ख्याल में गुज़र जायेगी
फिर भी न जाने क्यूं
मुझे लगता है –
तुम शायद नाराज़ हो मुझसे
आस-पास की चोरी
लूट-खसोट, मार-पीट
भष्टचार - चोर बाज़ारी
मंहगाई आत्याचार
मुझे क्यों नहीं दिखता ?
इन्हें हटाने के लिये मैं कुछ नहीं करता !
न जाने क्या सोचता हूं?
बस तुम्हारे ख्याल मैं रहता हूं
कभी-कभी सोचता हूं -
शायद तुम नाराज़ हो मुझसे
मैं क्यों कुछ नहीं करता
क्यों ख्याल में खोया रहता हूं ?
क्यों सपनों मैं सोया रहता हूं ?
मैं नहीं जानता
पर अक्सर सोचता हूं -
तुम बहुत नाराज़ हो मुझसे
नींद को झझकोड़ कर हटाता
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
छट-पट तैयार
आफिस की भागम-भाग
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
बॉस की सुनी
मातहद को सुनाई
दिनभर कोल्हू का बैल बना
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
शाम, दिन छिपे वापस
थका-मांदा घर लौटता हूं
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
फिर रात
वही घर, वही बिस्तर
करवट बदलता सोता हूं
तुम्हारे ख्याल में रहता हूं
उम्र कट जायेगी यूं ही
घर-आफिस के बीच की दौड़
तुम्हारे ख्याल में गुज़र जायेगी
फिर भी न जाने क्यूं
मुझे लगता है –
तुम शायद नाराज़ हो मुझसे
आस-पास की चोरी
लूट-खसोट, मार-पीट
भष्टचार - चोर बाज़ारी
मंहगाई आत्याचार
मुझे क्यों नहीं दिखता ?
इन्हें हटाने के लिये मैं कुछ नहीं करता !
न जाने क्या सोचता हूं?
बस तुम्हारे ख्याल मैं रहता हूं
कभी-कभी सोचता हूं -
शायद तुम नाराज़ हो मुझसे
मैं क्यों कुछ नहीं करता
क्यों ख्याल में खोया रहता हूं ?
क्यों सपनों मैं सोया रहता हूं ?
मैं नहीं जानता
पर अक्सर सोचता हूं -
तुम बहुत नाराज़ हो मुझसे
गुरुवार, 19 नवंबर 2009
लालच की पूजा
सुनते हैं भगवान होता है
गरीब का अन्नदाता ,
अमीर का रक्षक।
पूजते हैं दोनों
बड़ी लगन से
बहुत ही मन से
भिन्न भिन्न रूपों में
विभिन्न तरीकों से
एक ही ध्यान से
थोड़े लालच से ।
सोचते हैं
जगतपति हमें कुछ दे जायेगा
तो उसका क्या जायेगा।
आदमी
सुबह से शाम तक
कोल्हू के बैल सा पिसता
आदमी, चला जाता है
तपती रेत पर दोपहर को
धूप में, अपने पके बाल लिये
अपना खून पसीना एक करने।
अपनी जी तोड़ मेहनत के बाद भी
जीता है निस्तेज, संध्या के सूर्य सा
पर ऐसे नहीं
पहले वह मरता है,
फिर जीता है।
आत्म त्याग [1]
कल रात
अमीरी का लिबास ओढ़े
गर्म कपड़ों में लिपटा हुआ
मैं, दिल्ली प्रशासन की गाडि़यों में
सड़क पर फैली हुई
बिजली के खम्बों की रोशनी में
गरीबी के सताये
गरीबों को खोजने गया।
प्रशासकीय कर्मचारियों की सहायता से
बहुत खोजने पर
एक व्यक्ति को मैंने
एक दुकान के बाहर सोते देखा।
उसके पास ओढ़ने को
रेशमी शाल नहीं
एक फटे टाट के सिवा, कुछ न था
और बिछाने के लिये
डनलप के गद्दे नहीं
थोड़ा सा पुआल था।
मैंने उसे जगाया
और एक स्वेटर देने लगा
उसने लेने से इन्कार कर दिया
और बोला
- मेरे पास सब कुछ है,
देखते नहीं
पिछले साल खरीदा यह पाजामा
और गर्मियों मे खरीदी यह कमीज
क्या मेरे लिये काफी नहीं?
यह स्वेटर उधर सोते हुए आदमी को दे दो
उसके पास,
पहनने को फटी लंगोटी है
और ओढ़ने को कुछ नहीं।"
इतना कहने के बाद
वह अपने बिस्तर में घुसकर सो गया
उन बर्फीली हवाओं में
उसका आत्म त्याग देख
मैं ठगा सा रह गया।
[1] सन् 1974 में लिखी एक सत्य घटना पर आधारित कविता जो कि उस समय समाज सेवा करते समय घटी थी।
अमीरी का लिबास ओढ़े
गर्म कपड़ों में लिपटा हुआ
मैं, दिल्ली प्रशासन की गाडि़यों में
सड़क पर फैली हुई
बिजली के खम्बों की रोशनी में
गरीबी के सताये
गरीबों को खोजने गया।
प्रशासकीय कर्मचारियों की सहायता से
बहुत खोजने पर
एक व्यक्ति को मैंने
एक दुकान के बाहर सोते देखा।
उसके पास ओढ़ने को
रेशमी शाल नहीं
एक फटे टाट के सिवा, कुछ न था
और बिछाने के लिये
डनलप के गद्दे नहीं
थोड़ा सा पुआल था।
मैंने उसे जगाया
और एक स्वेटर देने लगा
उसने लेने से इन्कार कर दिया
और बोला
- मेरे पास सब कुछ है,
देखते नहीं
पिछले साल खरीदा यह पाजामा
और गर्मियों मे खरीदी यह कमीज
क्या मेरे लिये काफी नहीं?
यह स्वेटर उधर सोते हुए आदमी को दे दो
उसके पास,
पहनने को फटी लंगोटी है
और ओढ़ने को कुछ नहीं।"
इतना कहने के बाद
वह अपने बिस्तर में घुसकर सो गया
उन बर्फीली हवाओं में
उसका आत्म त्याग देख
मैं ठगा सा रह गया।
[1] सन् 1974 में लिखी एक सत्य घटना पर आधारित कविता जो कि उस समय समाज सेवा करते समय घटी थी।