रविवार, 9 जनवरी 2022

स्वप्न य साकार

वो हवा के झोंके सा आया
और बस छू कर चला गया
वो स्वप्न था? साकार था?
मैं तो सोचता ही रह गया।

रविवार, 26 सितंबर 2021

बेटी का दिन

आज का दिन ‘बेटी का दिन
जग में सब कहते हैं इसको
मुझको भी बोला जब सब ने
सोच में डूबा बैठा हूँ मैं
-    कौन दिवस बीता था ऐसे
जब याद न उसकी आयी मुझको

गोद में वो खेला करती है
किलकारी से भर देती है
जब भी हम घर पर आते हैं
हंसकर वो हम से मिलती है

ध्यान लगाकर वो पढ़ती है
अच्छे नंबर वो लाती है
नहीं असंभव कुछ भी उसको
सभी काम वो कर पाती है
डॉक्टर है वकील भी  है
अध्यापक है अफ़सर भी है
नभ में ऊपर वो उड़ती है
सेना मैं भी वो लड़ती है
कोई क्षेत्र बचा न उससे
बच्चों को वो ध्यान धरे है
बूढ़ों का भी मान  करे है

इन बातों को सोच समझ कर
मेरा मत कुछ अलग बना है
आज वो तुम सब से कहना है
एक दिवस की नहीं है बिटिया
वो सदा बसे है मन में मेरे
हर दिन उसके नाम लिखा है

रोज़ सुबह जब उठता हूँ
‘बेटी का दिन है’ - कहता हूँ
‘बेटी का दिन है’ - कहता हूँ

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

कितने निष्ठुर हो तुम

कितने निष्ठुर हो तुम 

किसी की सुनते नहीं हो 
किसी को देखते नहीं हो 
कोई कितना भी चीखे 
तुम्हें कोई चिंता नहीं, परवाह नहीं 

किसी की मृत्यु का समाचार 
तुम्हें कोई अंतर नहीं पड़ता 
वो मर गया – अपनी बला से 
उसको मार दिया – उनकी बला से 

तुम देखते तो होगे सब कुछ 
सुनते होगे जनता का शोर 
कैसे सह लेते हो सब 
फिर भी चुप रह जाते हो 

समझते हो सहनशील हो 
नहीं सहनशील नहीं हो 
बस संवेदनहीन हो तुम 
बहुत निष्ठुर हो 

तुम बड़े हो, 
दिल को बड़ा करो ! 
अपने आप से पूछो 
– क्यों हो तुम ? 
   इतने निष्ठुर क्यों हो तुम?